Donald Trump : अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर भारत की तेल नीति को लेकर चर्चा के केंद्र में हैं। रूस और ईरान से तेल खरीद पर पहले ही नाराज़गी जता चुके ट्रंप ने अब एक नया विकल्प सामने रखा है। उनके ताज़ा बयान ने अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में हलचल मचा दी है। ट्रंप का दावा है कि भारत अब ईरान की बजाय वेनेजुएला से कच्चा तेल खरीदने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
ट्रंप ने खुले मंच से कहा कि भारत वेनेजुएला के तेल में दिलचस्पी दिखा रहा है और इस दिशा में “डील का कॉन्सेप्ट” तैयार हो चुका है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि चीन भी चाहे तो इस समझौते का हिस्सा बन सकता है।
Donald Trump का बयान
ट्रंप के शब्दों में, अमेरिका पहले ही इस योजना पर काम कर चुका है और अब भारत की एंट्री होने जा रही है। इस बयान को महज टिप्पणी नहीं, बल्कि एक रणनीतिक संदेश के तौर पर देखा जा रहा है। व्हाइट हाउस के संकेत साफ हैं कि अमेरिका चाहता है कि भारत रूसी और ईरानी तेल पर अपनी निर्भरता कम करे। यूक्रेन युद्ध के बाद से वॉशिंगटन रूस के तेल राजस्व को सीमित करने की नीति पर काम कर रहा है। ऐसे में भारत जैसे बड़े आयातक का विकल्प बदलना अमेरिका के लिए बड़ी कूटनीतिक जीत मानी जा सकती है। ईरान पर लगे अमेरिकी प्रतिबंध पहले ही भारत के लिए मुश्किलें खड़ी कर चुके हैं।
वेनेजुएला पर अमेरिकी पकड़ का दावा
ट्रंप ने यह भी कहा कि अमेरिका ने वेनेजुएला के तेल संसाधनों पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित कर लिया है। उनके अनुसार, जनवरी में निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी के बाद हालात तेजी से बदले। इसी दौरान अमेरिका के दक्षिणी राज्यों की रिफाइनरियों के लिए वेनेजुएला से कच्चे तेल से भरे कई जहाज रवाना किए गए, जो हाल के महीनों में सबसे बड़ा शिपमेंट बताया जा रहा है।
अमेरिका की रणनीति
विशेषज्ञ मानते हैं कि अमेरिका वेनेजुएला के तेल को एक संतुलन हथियार की तरह इस्तेमाल करना चाहता है। एक तरफ रूस पर आर्थिक दबाव, दूसरी तरफ भारत और चीन जैसे देशों को वैकल्पिक सप्लाई यही ट्रंप की रणनीति का मूल है। गौर करने वाली बात यह है कि बीते साल अमेरिका ने वेनेजुएला से तेल खरीदने वाले देशों पर भारी टैरिफ भी लगाया था, जिसमें भारत का नाम शामिल था।
भारत के लिए नई चुनौती
अब सवाल यह है कि क्या भारत वास्तव में इस दिशा में कदम बढ़ाएगा। वेनेजुएला का तेल सस्ता तो हो सकता है, लेकिन भू-राजनीतिक जोखिम भी कम नहीं हैं। ट्रंप के बयान ने फिलहाल इतना जरूर साफ कर दिया है कि आने वाले समय में भारत की ऊर्जा नीति सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि कूटनीतिक कसौटी पर भी परखी जाएगी।
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