Uttarakhand : उत्तराखंड कांग्रेस इन दिनों अंदरूनी कलह से जूझती नजर आ रही है। पार्टी के दिग्गज नेता एकजुट होकर रणनीति बनाने के बजाय आपसी खींचतान में उलझे हुए दिख रहे हैं। चुनावी साल नजदीक आते ही यह स्थिति और गंभीर होती जा रही है, जिससे संगठन की मजबूती पर सवाल उठने लगे हैं। पूर्व मुख्यमंत्री Harish Rawat के ‘अर्जित अवकाश’ वाले बयान ने पार्टी में नई बहस छेड़ दी है। उनके इस कदम ने न सिर्फ नेतृत्व को चौंकाया, बल्कि बाकी नेताओं को भी सक्रिय कर दिया। माना जा रहा है कि यह कदम पार्टी के भीतर चल रही गुटबाजी को खुलकर सामने ले आया है।
पार्टी के भीतर अब एक तरह से दो धड़े साफ दिखाई दे रहे हैं। एक तरफ Harish Rawat का अनुभव और पुराना कद है, तो दूसरी ओर प्रदेश अध्यक्ष Ganesh Godiyal, प्रीतम सिंह और हरक सिंह रावत जैसे नेताओं की नई टीम। इस ‘त्रिमूर्ति’ के सामने हरदा अपना प्रभाव बनाए रखने की कोशिश में हैं, जिससे सियासी मुकाबला और दिलचस्प हो गया है।
Uttarakhand कांग्रेस में बढ़ी खींचतान
अगर इतिहास पर नजर डालें तो कांग्रेस को उत्तराखंड में 2002 और 2012 में सत्ता मिली, लेकिन गुटबाजी की समस्या कभी खत्म नहीं हुई। साल 2016 का सियासी संकट पार्टी के लिए बड़ा झटका साबित हुआ था। इसके बाद भी पार्टी इस बीमारी से उबर नहीं पाई और अब एक बार फिर वही स्थिति बनती दिख रही है। हाल के दिनों में संगठन के भीतर फैसलों को लेकर भी असहमति सामने आई है। प्रदेश कार्यकारिणी के गठन से लेकर नए नेताओं को शामिल करने तक कई मुद्दों पर मतभेद दिखे हैं। कुछ फैसलों से नाराजगी की खबरें भी सामने आई हैं, जिससे यह साफ है कि अंदरूनी तालमेल अभी भी कमजोर है।
चुनाव से पहले बड़ी चुनौती
आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती खुद को एकजुट रखना है। एक तरफ भाजपा पूरी ताकत के साथ मैदान में उतरने की तैयारी में है, तो दूसरी ओर कांग्रेस को अपने ही घर को संभालना पड़ रहा है। ऐसे में सवाल यही है कि क्या पार्टी समय रहते मतभेद भुलाकर मजबूत रणनीति बना पाएगी या फिर गुटबाजी ही उसकी राह में रोड़ा बनी रहेगी।
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