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भारत की डिफेंस कैपिटल बनने की राह पर UP, इतने रेंज की बनेंगी मिसाइलें

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UP News : देश का सबसे बड़ा राज्य उत्तर प्रदेश राजनीति और आबादी के लिए लिए पुरे भारत में जाना जाता है। हालांकि, अब यह राज्य रणनीतिक ताकत के केंद्र के रूप में भी पहचाना जा रहा है। यूपी डिफेंस कॉरिडोर के जरिए राज्य धीरे-धीरे भारत की रक्षा उत्पादन क्षमता का अहम हिस्सा बन रहा है। इसी कड़ी में राजधानी लखनऊ अब ब्रह्मोस सुपरसोनिक मिसाइल के निर्माण केंद्र के तौर पर वैश्विक मानचित्र पर उभर रहा है। उत्तर भारत में मौजूद सैन्य ठिकानों, बेहतर कनेक्टिविटी और डिफेंस कॉरिडोर की नीति ने लखनऊ को इस प्रोजेक्ट के लिए परफेक्ट बनाया।

अक्सर लोगों के मन में सवाल उठता है कि ब्रह्मोस जैसे हाईटेक हथियार के लिए लखनऊ को ही क्यों चुना गया। तो इस सवाल से परेशान होने की जरूरत नहीं है, बल्कि आज हम आपको इसके बारे में विस्तारपूर्वक बताएंगे, जिससे आपकी सारी शंका दूर हो जाएगी।

UP में रखी गई थी नींव

इस कहानी की शुरुआत साल 2018 से होती है, जब यूपी सरकार ने लखनऊ-कानपुर बेल्ट में 200 एकड़ जमीन ब्रह्मोस एयरोस्पेस को देने का प्रस्ताव रखा। इससे पहले हैदराबाद, नागपुर और तिरुवनंतपुरम जैसे शहरों में इसकी यूनिट मौजूद थीं, लेकिन बढ़ती मांग ने एक नए बड़े उत्पादन केंद्र की जरूरत पैदा कर दी। भारतीय नौसेना के युद्धपोतों और पनडुब्बियों में ब्रह्मोस की तैनाती तेजी से बढ़ी है। इसके साथ ही अंतरराष्ट्रीय बाजार से भी जबरदस्त मांग सामने आई। फिलीपींस के बाद वियतनाम, इंडोनेशिया, मलेशिया और खाड़ी देशों ने भी ब्रह्मोस में दिलचस्पी दिखाई, जिससे उत्पादन क्षमता बढ़ाना जरूरी हो गया।

380 करोड़ की अत्याधुनिक यूनिट

लखनऊ में स्थापित ब्रह्मोस एयरोस्पेस यूनिट करीब 380 करोड़ रुपये की लागत से तैयार की गई है। यहां मिसाइल के बूस्टर, वारहेड, असेंबली और क्लीनरूम जैसी अत्याधुनिक सुविधाएं मौजूद हैं। इस प्लांट से ब्रह्मोस के सभी वेरिएंट तैयार किए जा रहे हैं, जिनकी रेंज 290 से लेकर 600 किलोमीटर तक है। burx, 11 मई 2025 को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस यूनिट का उद्घाटन किया था। इस मौके पर उन्होंने कहा था कि लखनऊ की यह फैक्ट्री आत्मनिर्भर भारत के रक्षा संकल्प को मजबूत करेगी और देश को हथियार निर्माण में वैश्विक ताकत बनाएगी।

नाम में भी छुपा रिश्ता

ब्रह्मोस नाम अपने आप में एक कहानी कहता है। भारत की ब्रह्मपुत्र और रूस की मोस्क्वा नदी के नाम को जोड़कर इस मिसाइल का नाम रखा गया है। यह भारत के डीआरडीओ और रूस की एनपीओएम के संयुक्त सहयोग का प्रतीक है, जिसमें भारत की हिस्सेदारी 50.5 प्रतिशत है। ब्रह्मोस ध्वनि की गति से तीन गुना तेज उड़ान भरती है और दुश्मन को संभलने का मौका तक नहीं देती। जमीन, हवा और समुद्र तीनों प्लेटफॉर्म से लॉन्च होने वाली यह मिसाइल फायर एंड फॉरगेट तकनीक पर काम करती है। रडार से बचते हुए सटीक हमला इसकी सबसे बड़ी ताकत है।

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