US Supreme Court : अमेरिका की सर्वोच्च अदालत ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के वैश्विक टैरिफ को अवैध करार देकर अंतरराष्ट्रीय व्यापार की दिशा बदल दी है। चीफ जस्टिस जॉन रॉबर्ट्स की अगुवाई में आए 6-3 के फैसले में अदालत ने कहा कि व्यापक स्तर पर लगाए गए टैरिफ राष्ट्रपति के अधिकार क्षेत्र से बाहर थे। इस निर्णय ने ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के आर्थिक एजेंडे को झटका दिया है और कई देशों, खासकर भारत, को बड़ी राहत दी है।
फैसले के तुरंत बाद ट्रंप ने नया घोषणापत्र जारी कर 150 दिनों के लिए 10 प्रतिशत का अस्थायी ‘इंपोर्ट सरचार्ज’ लगाने की घोषणा की। यह शुल्क 24 फरवरी 2026 से अमेरिकी पूर्वी समयानुसार रात 12:01 बजे से प्रभावी होगा। यह कदम 1974 के ट्रेड एक्ट के सेक्शन 122 के तहत उठाया गया है और कांग्रेस की मंजूरी तक लागू रहेगा।
US Supreme Court का फैसला
पहले भारत पर कुल प्रभावी टैरिफ 50 प्रतिशत तक पहुंच गया था। अगस्त में 25 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क लगाया गया, फिर रूस से कच्चा तेल खरीदने के मुद्दे पर और 25 प्रतिशत जोड़ दिया गया। बाद में अंतरिम व्यापार समझौते के तहत इसे 18 प्रतिशत तक घटाया गया। अब नए आदेश के बाद भारतीय निर्यात पर केवल 10 प्रतिशत अस्थायी सरचार्ज लागू होगा, जो मौजूदा एमएफएन ड्यूटी के अतिरिक्त होगा। उदाहरण के तौर पर, यदि किसी उत्पाद पर 5 प्रतिशत बेस ड्यूटी है तो कुल प्रभावी शुल्क 15 प्रतिशत होगा।
ट्रेड डील की समीक्षा की मांग
फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गेनाइजेशन्स (FIEO) के डायरेक्टर जनरल अजय सहाय ने इसे भारतीय उद्योग के लिए सकारात्मक संकेत बताया। वहीं ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) के फाउंडर अजय श्रीवास्तव का मानना है कि भारत को अमेरिका के साथ अंतरिम व्यापार समझौते की दोबारा समीक्षा करनी चाहिए। उनका तर्क है कि अब रेसिप्रोकल टैरिफ सीमित दायरे में लागू हो रहे हैं और बड़ी संख्या में उत्पाद छूट श्रेणी में हैं।
भारत-अमेरिका व्यापार के मायने
2021 से 2025 के बीच अमेरिका, भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार रहा। कुल निर्यात में लगभग 18 प्रतिशत हिस्सेदारी अमेरिका की है, जबकि आयात में 6.22 प्रतिशत और द्विपक्षीय व्यापार में 10.73 प्रतिशत योगदान है। वित्त वर्ष 2024-25 में दोनों देशों के बीच व्यापार 186 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है। ट्रंप प्रशासन का कहना है कि अमेरिका भारी व्यापार घाटे से जूझ रहा है। 2024 में वस्तुओं के व्यापार में 1.2 ट्रिलियन डॉलर का घाटा दर्ज किया गया, जो 2008 के बाद सबसे अधिक है। प्रशासन का दावा है कि अस्थायी आयात सरचार्ज से डॉलर के बहिर्वाह पर अंकुश लगेगा और घरेलू उद्योग को बढ़ावा मिलेगा।
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