सुशांत का सच कौन छुपा रहा है – परिवार या सरकार ?

Bihar, Patna सुशांत सिंह राजपूत मामला कुछ ज्यादा ही टीआरपी ले रहा है। 31 जुलाई से फिर जो इस मामले का टीवी, सोशल मीडिया शेयर बाजार उछला उसके पीछे की दो-तीन कहानी है। मुंबई पुलिस की किरकिरी, आदित्य ठाकरे का नाम घसीटने, बिहार सरकार की अचानक सक्रियता सबकी कहानी अलग है।

सुशांत सिंह राजपूत और मुंबई पुलिस की किरकिरी

*14 जून को सुशांत की मौत हुई, उसके बाद जुलाई महीने तक बॉलीवुड निशाने पर था। लेकिन फिर 14 जुलाई को मुंबई पुलिस के पास एक मामला दर्ज हुआ जिसमें सोशल मीडिया के विभिन्न माध्यमों पर फर्जी लाइक, फर्जी व्यूज, फर्जी फॉलोवर बढ़ाने के गोरखधंधे में संलिप्त धंधेबाज फंदे में फंस गए। यह बॉट्स और रोबोटिक तरीके से खेल होता है। इसमें देश भर में फैले सोशल मीडिया गोरखधंधे बाजों के गर्दन तक पुलिस पहुंचने वाली थी। मुंबई पुलिस की उस तत्परता से इन धंधेबाजों को खतरा है, उनके साथ-साथ इसको इस्तेमाल करने वाली एक बड़ी पार्टी भी बेनकाब हो जाती।

14 जून को सुशांत की मौत

यह सब तो उसी के पालतू हैं। फिर शुरू हुआ एक नया खेल, जिसमें सुशांत सिंह राजपूत की कहानी का इस्तेमाल। वह खेल जिसमें मुंबई पुलिस और आदित्य ठाकरे को लपेट लिया गया।

आप देखेंगे तो उसके बाद ही मुंबई पुलिस और आदित्य ठाकरे को निशाना बनाकर सोशल मीडिया पर अभियान शुरू हुआ। एक कहानी आदित्य ठाकरे के बारे में गढ़ी गई और वह 1 अगस्त से जबरदस्त वायरल किया गया। वायरल करने वाले तो तैयार बैठे ही थे। उन्हें तो अपना दामन बचाने के लिए बेमतलब बवाल खड़ा करना था। उन्होंने किया। अब शायद समझ गए होंगे कि आदित्य ठाकरे और मुंबई पुलिस कैसे निशाने पर आ गई?

सूरज पंचोली, आदित्य ठाकरे और कई बड़े बड़े नामों को इस प्रकरण में घसीटा गया
  • दूसरी कहानी है बिहार सरकार एवं बिहार पुलिस की अतिसक्रियता का। पटना के राजीव नगर थाने में 25 जुलाई को प्राथमिकी दर्ज हुई। मीडिया में 28 जुलाई से प्रकाश में आया। यह प्राथमिकी 14 जून को सुशांत सिंह राजपूत की अप्राकृतिक मौत के बाद जो मीडिया और सोशल मीडिया में कहा जा रहा था उसके बिल्कुल उलट था। तब यह कहा गया था कि सुशांत बॉलीवुड के नेपोटिज्म, परिवारवाद, भाई-भतीजावाद का शिकार हुआ।
सुशांत बॉलीवुड के नेपोटिज्म, परिवारवाद, भाई-भतीजावाद का शिकार हुआ
  • उसे बाहरी मानकर कथित बॉलीवुड गैंग ने प्रताड़ित कर मौत को गले लगाने को मजबूर किया या, मार दिया। जो प्राथमिकी सुशांत के पिता ने दर्ज कराई उसमें कहीं इसका जिक्र नहीं था। बल्कि, उन्होंने तो स्वीकार कर लिया कि आत्महत्या किया है, वह डिप्रेशन से ग्रस्त था। फिर इतना बवाल क्यों? अब यहीं बिहार सरकार की अपनी मतलबपरस्ती सामने आती है। बाढ़ और करोना से निबटने में पूरी तरह विफल बिहार सरकार, बांध एवं पुल के एप्रोच रोड ध्वस्त होने से लगातार किरकिरी झेल रही सरकार अपनी छवि बचाने के लिए सुशांत सिंह राजपूत के मामले को बखूबी इस्तेमाल किया।
  • इसमें उस एक मंत्री ने जबरदस्त भूमिका निभाई जिसकी सबसे अधिक किरकिरी हो रही थी। उनका उस सोशल मीडिया माफिया गैंग से भी ताल्लुक है। सबसे बड़ी बात अपनी पुलिसिंग के लिए बदनाम बिहार पुलिस भी स्कॉटलैंड यार्ड से आगे निकल गई। लगता है देश में बिहार पुलिस से बेहतर कोई पुलिसिंग कर ही नहीं सकता है। बिहार में अनेकों दास्तान है जहां बिहार पुलिस आज तक मामले का उद्भेदन नहीं कर पाई। इसी नीतीश सरकार में आकाश पांडेय का अपहरण हुआ था, आज तक पता नहीं चला। राजधानी में सत्ता की नाक के नीचे बेली रोड से अपहरण हुआ था, बिहार पुलिस यह पता नहीं कर पाई कि आखिर आकाश को जमीन निगल गई या, आसमान! आकाश के घर में दशकों से होली-दीवाली और राखी में उसकी बहन उसका अंतहीन इंतजार कर रही है। ऐसे सैकड़ों आकाश हैं। मुज़फ़्फ़रपुर की नवरुणा चक्रवर्ती के मामले के बारे में सब जानते हैं। बिहार के महाबली डीजीपी साहब वहीं थे, उन्होंने उस बेटी के बाप का विश्वास क्यों खो दिया?
  • जेम्स बांड बनकर उस बच्ची के पिता को क्यों नहीं न्याय दिलाते? इसी पटना में पिछले होली में जदयू के छात्र नेता कन्हैया कौशिक की हत्या हुई, उसमें आज तक न्याय हुआ क्या? ऐसे हज़ारों मामले हैं, फिर भी बिहार पुलिस को ऐसे बताया जाता है, जैसे उसके सुर्खाब के पर लग गए हों!
बाढ़ और करोना से निबटने में पूरी तरह विफल बिहार सरकार, बांध एवं पुल के एप्रोच रोड ध्वस्त होने से लगातार किरकिरी झेल रही सरकार अपनी छवि बचाने के लिए सुशांत सिंह राजपूत के मामले को बखूबी इस्तेमाल किया।
  • जहां तक सुशांत को न्याय एवं उसके अपराधियों को कठोर दंड दिलाने का मामला है तो सीबीआई उस मामले में सबसे विफल अनुसंधान संगठन साबित हुई है। विशेषकर मौत और हत्या के मामले में सजा दिलवाना तो दूर अपराधियों को चिन्हित करने में भी विफल रही है। सिर्फ बिहार में ही दर्जनों मामले हैं जो सीबीआई के नकारेपन की कहानी को बयां कर देते हैं। नवरुणा चक्रवर्ती, ब्रह्मेश्वर मुखिया आदि दर्जनों मामले हैं। अभी सबसे नया मसला सृजन घोटाले का है, जिसमें मुख्य अभियुक्त अमित और उसकी पत्नी प्रिया को ढूंढ भी नहीं पाई सीबीआई। फिर भी सीबीआई-सीबीआई की रट लगाया जा रहा है। पूरे मामले का राजनीतिकरण कर, इस मामले में सकारात्मक परिणाम की रत्ती भर अगर संभावनाएं थी तो उसका गला घोंट दिया गया। अब शायद ही इसमें न्याय हो पाएगा!

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