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Supreme Court में आवारा कुत्तों पर तीखी बहस, चूहे-बिल्लियों तक पहुंचा मामला

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Supreme Court on Stray Dogs : देशभर में आवारा कुत्तों की बढ़ती संख्या और उससे जुड़ी समस्याओं को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है। इस दौरान पशु कल्याण और आम जनता की सुरक्षा के बीच संतुलन को लेकर अदालत में तीखी बहस देखने को मिली। सुनवाई में अलग-अलग पक्षों की दलीलों ने इस मुद्दे को और जटिल बना दिया है। एनिमल वेलफेयर की ओर से पेश हुए एडवोकेट सीयू सिंह ने अदालत में आवारा कुत्तों का पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि अगर गलियों और मोहल्लों से अचानक कुत्तों को हटा दिया गया, तो इसका असर पूरे इकोसिस्टम पर पड़ेगा। उनके मुताबिक, इससे चूहों की संख्या तेजी से बढ़ सकती है, जो एक नई समस्या को जन्म देगी।

एडवोकेट की इस दलील पर सुप्रीम कोर्ट के जज ने हल्के अंदाज में लेकिन गंभीर सवाल उठाया। अदालत ने कहा कि अगर कुत्तों के हटने से चूहे बढ़ेंगे, तो क्या इसका समाधान बिल्लियों को लाकर किया जाएगा? इस टिप्पणी ने सुनवाई के दौरान मौजूद सभी लोगों का ध्यान खींच लिया।

Supreme Court में बहस

सीयू सिंह ने आगे कहा कि बड़ी संख्या में आवारा कुत्तों को एक ही शेल्टर में रखना व्यावहारिक नहीं है। ऐसा करने से बीमारियों के फैलने का खतरा रहता है। उन्होंने सुझाव दिया कि देशभर में लगभग 91,800 नए शेल्टर बनाए जाने चाहिए, ताकि कुत्तों की देखभाल वैज्ञानिक और सुरक्षित तरीके से हो सके।

वहीं, सीनियर एडवोकेट ध्रुव मेहता ने अदालत में कहा कि आवारा कुत्तों की आखिरी आधिकारिक मॉनिटरिंग साल 2009 में हुई थी। उस समय दिल्ली में करीब 5.6 लाख कुत्ते दर्ज किए गए थे। उनका कहना था कि बीते वर्षों में इनकी संख्या काफी बढ़ चुकी है, इसलिए नए सिरे से सर्वे और निगरानी बेहद जरूरी है।

एनजीओ के काम का जिक्र

एक अन्य याचिकाकर्ता की ओर से सीनियर एडवोकेट नकुल दीवान ने एनजीओ के प्रयासों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि उनके क्लाइंट की संस्था में 45 लोग काम करते हैं, जिन्होंने अब तक 66 हजार से ज्यादा कुत्तों की जान बचाई है और करीब 15 हजार कुत्तों की नसबंदी करवाई है। सीयू सिंह ने अदालत को यह भी याद दिलाया कि कई इलाकों में बंदरों की समस्या पहले से मौजूद है। उनका तर्क था कि अगर कुत्तों को हटाया गया, तो बंदरों की संख्या बढ़ सकती है, जिसके परिणाम गंभीर हो सकते हैं। उन्होंने पुराने उदाहरणों का हवाला देते हुए संतुलित नीति अपनाने की बात कही।

सभी दलीलों को सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि समस्या का स्थायी समाधान एनिमल बर्थ कंट्रोल (ABC) नियमों के सही और प्रभावी क्रियान्वयन में है। अदालत ने संकेत दिए कि बिना संतुलन बनाए किसी एक कदम से हालात और बिगड़ सकते हैं।

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