Shiv-Kamdev Katha : हिंदू धर्मग्रंथों में भगवान शिव को वैराग्य, तप और योग का सर्वोच्च प्रतीक माना गया है। सती के देह त्याग के बाद महादेव संसार से विरक्त होकर घोर तपस्या में लीन हो गए थे। उनका ध्यान इतना अडिग था कि देवताओं तक की पुकार वहां नहीं पहुंच पा रही थी। लेकिन समय ऐसा था, जब सृष्टि की रक्षा के लिए इस तपस्या का भंग होना जरूरी हो गया। जब तक शिव विवाह नहीं करते, तब तक संतान का जन्म संभव नहीं था और तारकासुर का वध भी नहीं हो सकता था।
शिव पुराण के अनुसार, तारकासुर नाम का एक शक्तिशाली असुर तीनों लोकों में आतंक फैला रहा था। उसे यह वरदान मिला था कि उसका अंत केवल भगवान शिव के पुत्र के हाथों ही होगा। समस्या यह थी कि शिव योग-साधना में लीन थे और विवाह से कोसों दूर।
Shiv-Kamdev Katha: जब प्रेम ने तपस्या को छुआ
देवताओं ने अनेक उपाय किए, लेकिन कोई भी सफल नहीं हुआ। अंत में उन्हें प्रेम के देवता कामदेव की याद आई। कामदेव जानते थे कि शिव की समाधि भंग करना कितना बड़ा जोखिम है, फिर भी सृष्टि की रक्षा के लिए उन्होंने यह कठिन जिम्मेदारी स्वीकार की। यह निर्णय आसान नहीं था, लेकिन हालात ने उन्हें आगे बढ़ने को मजबूर कर दिया। कामदेव ने वातावरण को वसंतमय बना दिया। चारों ओर सुगंध, कोमलता और सौंदर्य फैल गया। इसी क्षण उन्होंने शिव की ओर प्रेम का पुष्प बाण छोड़ा, ताकि उनके हृदय में पार्वती के प्रति आकर्षण जागे। यह वही पल था, जिसने ब्रह्मांड की दिशा बदल दी।
तीसरे नेत्र की अग्नि
जैसे ही शिव की समाधि टूटी, वे प्रचंड क्रोध में आ गए। तपस्या में बाधा उन्हें असहनीय लगी। महादेव ने अपना तीसरा नेत्र खोला और उससे निकली अग्नि ने कामदेव को उसी क्षण भस्म कर दिया। प्रेम के देवता शरीर रहित हो गए और ‘अनंग’ कहलाए। अपने पति को भस्म होता देख रति का हृदय टूट गया। उन्होंने शिव से क्षमा याचना की और करुण पुकार लगाई। महादेव का क्रोध शांत हुआ और उन्होंने बताया कि यह सब सृष्टि के कल्याण के लिए आवश्यक था। कामदेव का अंत नहीं हुआ, केवल उनका रूप बदला।
पुनर्जन्म का वरदान
शिव ने रति को आश्वासन दिया कि द्वापर युग में कामदेव भगवान कृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न के रूप में जन्म लेंगे और दोनों का पुनर्मिलन होगा। इस तरह प्रेम, तप और त्याग की यह कथा सिखाती है कि कभी-कभी विनाश भी नई सृष्टि का मार्ग खोलता है।





