Share Market : शेयर बाजार में उतरते ही ज्यादातर रिटेल निवेशक खुद को समझदार मानते हैं, लेकिन हकीकत में उनके फैसलों की डोर अक्सर भावनाओं के हाथ में होती है। डर, लालच और भीड़ का असर इतना गहरा होता है कि तर्क और आंकड़े पीछे छूट जाते हैं। इसी मनोवैज्ञानिक कमजोरी को बाजार की भाषा में बिहेवियरल बायस कहा जाता है, जिसका फायदा बड़े खिलाड़ी और तथाकथित मार्केट गुरु उठाते हैं।
बिहेवियरल बायस दरअसल सोचने का वह ढर्रा है, जो बार-बार निवेशकों को गलत दिशा में ले जाता है। इसमें दिमाग शॉर्टकट अपनाता है और भावनाएं फैसले लेने लगती हैं। कोई ट्रेंड देखकर बिना सोचे-समझे निवेश कर देता है, कोई घाटे वाले शेयर को उम्मीद में पकड़े रहता है, तो कोई अपनी काबिलियत को जरूरत से ज्यादा आंक बैठता है।
Share Market: रिटेल इन्वेस्टर्स की सबसे बड़ी भूल
भारतीय रिटेल निवेशकों पर की गई स्टडी में सामने आया है कि हर्डिंग, लॉस एवर्जन, ओवरकॉन्फिडेंस और एंकरिंग सबसे आम गलतियां हैं। बाजार गिरते ही निवेशक डरकर पैसे निकाल लेते हैं और जब हर तरफ तेजी की चर्चा होती है, तब ऊंचे स्तर पर खरीदारी कर बैठते हैं। इस पूरे व्यवहार में रणनीति कम और भावना ज्यादा काम करती है। विशेषज्ञ मानते हैं कि बिहेवियरल बायस की जड़ें इंसानी विकास से जुड़ी हैं। शुरुआती दौर में इंसान खतरे से बचने के लिए डर और अनुमान पर निर्भर था। वही प्रवृत्ति आज धन से जुड़े फैसलों में भी दिखती है। हालात बदले, साधन बदले, लेकिन सोचने का तरीका बहुत ज्यादा नहीं बदला।
लॉन्ग टर्म कहकर रोज पोर्टफोलियो देखना
SLA Finserv के फाउंडर और CEO आशीष मोदानी बताते हैं कि बिहेवियरल बायस की पहचान आसान है। कोई निवेशक खुद को लॉन्ग टर्म बताता है, लेकिन दिन में कई बार ऐप खोलकर पोर्टफोलियो चेक करता है। हर निवेशक चाहता है कि पैसा जल्दी और ज्यादा बढ़े। इसी लालच में वह जोखिम को नजरअंदाज कर देता है। सच यह है कि बड़े निवेशकों और कारोबारियों को भी नुकसान होता है। फर्क सिर्फ इतना है कि वे नुकसान को स्वीकार करना जानते हैं, जबकि आम निवेशक उससे डर जाता है।
क्या है समाधान?
विशेषज्ञों के मुताबिक, उभरती अर्थव्यवस्था जैसे भारत में बेहतर रिटर्न के लिए डायवर्सिफाइड फंड में लंबे समय तक निवेश जरूरी है। नियमित निवेश और धैर्य से ही फायदा मिलता है। इसके साथ ही एक अनुभवी फाइनेंशियल एडवाइजर निवेशक को भावनात्मक फैसलों से बचा सकता है। आशीष मोदानी बताते हैं कि म्यूचुअल फंड्स ने ऐतिहासिक तौर पर 12-15% रिटर्न दिया है, लेकिन निवेशकों को औसतन सिर्फ 7-8% ही मिला।
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