Screen Time Effects on Brain : आज की सबसे आम तस्वीर जेब में रखा फोन है, जिसका बार-बार इस्तेमाल करना आदत में शुमार हो चुका है। न कोई कॉल, न जरूरी काम, फिर भी उंगलियां स्क्रीन खोल देती हैं। बस में सफर हो, चाय का इंतजार या किसी मीटिंग के बीच का ब्रेक, मोबाइल देखे बिना रह पाना जैसे असहज हो गया है। इसके बिना लोगों को जीवन अधूरा सा हो गया है। सुबह उठकर जहां लोग पहले न्यूज पेपर पढ़ते थे, घरवालों के साथ बैठकर बातचीत करते थे वहीं अब माहौल ही पूरा बदल चुका है। सुबह उठकर लोग सबसे पहले अपना फोन ही उठाते हैं। इस टेक्नोलॉजी ने जितना जीवन को सरल बनाया है, उतना ही बुरी आदतों का भी आदि बना चुका है। यह धीरे-धीरे सोशल कनेक्टिविटी को खत्म करता जा रहा है। लोग एक-दूसरे से बातचीत करने से पहले सोचते हैं। एक ही कमरे में 4 लोग होने के बावजूद भी कोई एक-दूसरे से बात नहीं करता, बल्कि अपने-अपने फोन में घूसे रहते हैं।
यह महज आदत नहीं, बल्कि हमारे दिमाग में बदलते व्यवहार का संकेत है। कुछ साल पहले खाली समय सुकून देता था, अब वही बेचैन करता है। कुछ न करना हमें अजीब लगने लगा है। मन तुरंत किसी न किसी डिजिटल चीज में उलझना चाहता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह बेचैनी इस बात का इशारा है कि हम शांति को सहन करना भूलते जा रहे हैं।
Screen Time Effects on Brain: डिफॉल्ट मोड नेटवर्क
वैज्ञानिक बताते हैं कि जब इंसान बिना किसी काम के होता है, तब दिमाग का ‘डिफॉल्ट मोड नेटवर्क’ एक्टिव होता है। यही हिस्सा आत्मचिंतन, कल्पनाशीलता और भावनात्मक संतुलन के लिए जरूरी है। लगातार नोटिफिकेशन, रील्स और शॉर्ट वीडियो इस प्रक्रिया को तोड़ देते हैं। दिमाग को ठहरने का मौका ही नहीं मिलता। सोशल मीडिया दिमाग को बार-बार छोटा-सा सुख देता है। हर स्क्रॉल पर डोपामिन का हल्का झटका मिलता है। शुरुआत में यह अच्छा लगता है, लेकिन धीरे-धीरे दिमाग लंबे समय तक किसी एक चीज पर ध्यान टिकाना भूलने लगता है। यही वजह है कि पढ़ाई, काम या बातचीत में भी मन जल्दी भटक जाता है।
फोकस और धैर्य खत्म
न्यूरोसाइंटिस्ट्स की मानें तो लगातार स्क्रीन देखने से फोकस करने की क्षमता में भारी गिरावट आती है। इंसान जल्द ऊब जाता है, चिड़चिड़ापन बढ़ता है और मानसिक थकान महसूस होने लगती है। छोटे-छोटे काम भी बोझ जैसे लगने लगते हैं। खाली समय से भागने की आदत रचनात्मक सोच को भी कमजोर कर देती है। जब दिमाग को भटकने और खुद से बात करने का वक्त नहीं मिलता, तो नए विचार भी जन्म नहीं लेते। फैसले जल्दबाजी में होने लगते हैं और तनाव छोटी बातों पर हावी हो जाता है।
मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि ऊब कोई दुश्मन नहीं है। यह दिमाग की मरम्मत का समय होता है। इसी दौरान इंसान अपने भीतर झांकता है और भावनात्मक संतुलन बनाता है। जानबूझकर कुछ समय बिना स्क्रीन के बिताना दिमाग के लिए उतना ही जरूरी है, जितना नींद है।
दिन में कितनी बार देखते हैं फोन?
शोध बताते हैं कि एक आम व्यक्ति दिन में 90 से ज्यादा बार फोन चेक करता है। खाली समय मिलते ही ज्यादातर लोग सबसे पहले स्क्रीन की ओर देखते हैं। बच्चों और किशोरों में यह आदत और तेजी से बढ़ रही है, जिसे विशेषज्ञ “बोरडम इंटॉलरेंस” कहते हैं। मुद्दा यह नहीं कि मोबाइल छोड़ दिया जाए। सवाल बस इतना है कि क्या हम अपने दिमाग को थोड़ी देर शांत रहने देना चाहते हैं? क्योंकि जब इंसान ऊबना भूल जाता है, तो गहराई से सोचना भी भूल जाता है। यही आज के दौर की सबसे बड़ी मानसिक चुनौती बनती जा रही है।
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