Royal : गरम तंदूर से निकली, ऊपर से मक्खन की परत चढ़ी नान जब थाली में आती है तो पूरा खाना खास बन जाता है। पनीर की गाढ़ी सब्जी हो या मसालेदार बटर चिकन, नान के बिना स्वाद अधूरा लगता है। लेकिन आज हर रेस्टोरेंट में आसानी से मिलने वाली यह रोटी कभी आम लोगों की पहुंच से दूर थी। एक दौर था जब इसे सिर्फ बादशाहों की रसोई में तैयार किया जाता था।
नान की शुरुआत प्राचीन फारस, यानी आज के Iran से मानी जाती है। ‘नान’ शब्द फारसी भाषा का है, जिसका अर्थ ही रोटी होता है। शुरुआती दौर में इसे आटे और पानी से गूंथकर गर्म पत्थरों पर पकाया जाता था।
Royal दावत से ढाबों तक…
भारत में इसका प्रवेश 13वीं से 16वीं शताब्दी के बीच हुआ, जब दिल्ली सल्तनत के शासक अपने साथ तंदूर और नई पाक तकनीकें लेकर आए। यहीं से नान ने हिंदुस्तानी रसोई में कदम रखा। उस समय नान बनाना आसान काम नहीं था। इसमें खमीर का इस्तेमाल होता था, जो महंगा और दुर्लभ माना जाता था। इसे मुलायम बनाने के लिए खास तरह से गूंथने की विधि अपनाई जाती थी। यही वजह थी कि यह रोटी आम घरों तक नहीं पहुंच सकी। पुराने दस्तावेजों में नान-ए-तनुक (पतली और नाजुक) और नान-ए-तनूरी (तंदूर में पकी मोटी रोटी) का जिक्र मिलता है। मुगल दौर में परतदार नान-ए-वरकी और छोटी नान-ए-तंगी जैसे प्रयोग भी सामने आए, जो ग्रेवी के साथ खूब जंचते थे।
महलों से बाजार तक का सफर
समय बदला तो नान का सफर भी बदल गया। ब्रिटिश शासन के दौरान यह व्यंजन सीमाओं से बाहर पहुंचा। धीरे-धीरे इसे बनाने की तकनीक सरल हुई और मैदा, दही व खमीर के मिश्रण से तैयार होने लगी। तंदूर अब सिर्फ शाही रसोई तक सीमित नहीं रहा, बल्कि ढाबों और होटलों में भी नजर आने लगा। हाथों से थपथपाकर तंदूर की दीवार पर चिपकाई जाने वाली नान पर जब घी या मक्खन लगाया जाता, तो उसकी खुशबू दूर तक फैल जाती।
वैश्विक पहचान
आज नान कई रूपों में उपलब्ध है। बटर गार्लिक नान, आलू नान, पनीर नान और यहां तक कि विदेशी रेस्टोरेंट्स में ट्रफल चीज़ नान भी परोसी जा रही है। 90 के दशक के बाद शेफ ने इसमें नए स्वाद जोड़े और इसे अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई। नान अब सिर्फ एक रोटी नहीं, बल्कि संस्कृतियों के मेल की कहानी है। फारस से शुरू हुआ यह सफर आज पूरी दुनिया की थाली में सजा नजर आता है।
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