Qatar Attacks : पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष का प्रभाव अब स्वास्थ्य सेवाओं पर भी दिखाई देने लगा है। हाल ही में Qatar के औद्योगिक शहर Ras Laffan Industrial City पर हुए हमले ने वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को प्रभावित कर दिया है। यह शहर दुनिया के सबसे बड़े तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) प्रसंस्करण और निर्यात केंद्रों में से एक माना जाता है। इस घटना के बाद तरल हीलियम की आपूर्ति बाधित होने लगी है, जिसका असर भारत समेत कई देशों में देखा जा रहा है। तरल हीलियम गैस एलएनजी उत्पादन प्रक्रिया से जुड़ी होती है। इसी गैस का इस्तेमाल अस्पतालों में मौजूद एमआरआई मशीनों को चलाने के लिए किया जाता है।
भारत में इस गैस की आपूर्ति का लगभग 30 प्रतिशत हिस्सा विदेशों से आता है। हालिया घटनाओं के बाद सप्लाई बाधित होने लगी है, जिससे मेडिकल क्षेत्र में चिंता बढ़ गई है। एमआरआई इंस्टॉलेशन से जुड़े कारोबारी एस.ए. खान के मुताबिक कुछ दिन पहले तक लिक्विड हीलियम करीब 1200 रुपये प्रति लीटर मिल रही थी।
Qatar Attacks से मेडिकल सेक्टर पर असर
सप्लाई प्रभावित होने के बाद इसकी कीमत तेजी से बढ़कर लगभग 2300 से 2400 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच गई है। अचानक आई इस बढ़ोतरी का सीधा असर मेडिकल जांच की लागत पर पड़ रहा है। हीलियम की कीमत बढ़ने के कारण कई निजी डायग्नोस्टिक सेंटरों ने एमआरआई जांच के शुल्क में बढ़ोतरी शुरू कर दी है। पहले जहां दिमाग का एमआरआई लगभग साढ़े तीन से चार हजार रुपये में हो जाता था, वहीं अब इसकी कीमत कई जगहों पर साढ़े चार से पांच हजार रुपये तक पहुंच गई है। इससे मरीजों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ने लगा है।
बढ़ी प्रतीक्षा सूची
निजी केंद्रों में बढ़ी कीमतों का असर सरकारी और रियायती दर पर जांच करने वाले संस्थानों पर भी पड़ा है। उदाहरण के तौर पर Teerthanker Mahaveer University के मेडिकल कॉलेज में एमआरआई के लिए प्रतीक्षा सूची पहले दो-तीन दिन की होती थी, जो अब बढ़कर 10 से 15 दिन तक पहुंच गई है। मरीजों की संख्या बढ़ने से जांच के लिए लंबा इंतजार करना पड़ रहा है। चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, तरल हीलियम एमआरआई मशीन के लिए बेहद जरूरी तत्व है।
यह मशीन में लगे सुपरकंडक्टिंग मैग्नेट को लगभग -269 डिग्री सेल्सियस के अत्यंत कम तापमान पर ठंडा रखता है। इसी स्थिति में चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न होता है, जिससे शरीर के अंदरूनी हिस्सों की स्पष्ट तस्वीर ली जा सकती है। बिना हीलियम के यह मशीन सही तरीके से काम नहीं कर पाती।
मशीनों की बढ़ रही मांग
हीलियम की बढ़ती कीमतों के कारण कुछ निजी लैब अब कम गैस खपत करने वाली 1.5-टेस्ला मशीनों का ज्यादा इस्तेमाल कर रही हैं। हालांकि, विशेषज्ञ मानते हैं कि 3-टेस्ला मशीनों की इमेज क्वालिटी अधिक बेहतर होती है। एक सामान्य थर्ड जेनरेशन एमआरआई मशीन को सालभर में लगभग 1200 लीटर तरल हीलियम की जरूरत होती है, जिससे इसके संचालन की लागत भी काफी बढ़ जाती है।
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