NSE IPO : देश के सबसे बड़े शेयर बाजार मंच National Stock Exchange of India की बहुप्रतीक्षित लिस्टिंग एक बार फिर कानूनी पचड़े में फंसती नजर आ रही है। लगभग एक दशक से सार्वजनिक होने की कोशिश कर रहा एक्सचेंज अब नई याचिका के कारण सुर्खियों में है। एक्सचेंज के प्रस्तावित आईपीओ को लेकर नियामक की ओर से मिली हरी झंडी के खिलाफ दिल्ली हाई कोर्ट में रिट याचिका दायर की गई है। इससे बाजार में यह सवाल उठने लगे हैं कि क्या लिस्टिंग की प्रक्रिया फिर टल जाएगी।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, नई दिल्ली निवासी 72 वर्षीय पूर्व न्यायिक अधिकारी केसी अग्रवाल ने 10 फरवरी को यह याचिका दायर की। उन्होंने 30 जनवरी को Securities and Exchange Board of India द्वारा जारी नो-ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट पर सवाल खड़े किए हैं।
NSE IPO पर फिर अड़ंगा
अग्रवाल का कहना है कि नियामक ने बिना स्वतंत्र समीक्षा के एक्सचेंज की कार्यवाही को सही ठहरा दिया। हाई कोर्ट में इस सप्ताह सुनवाई की संभावना जताई जा रही है, जिसका असर सीधे तौर पर आईपीओ की टाइमलाइन पर पड़ सकता है। याचिका का मुख्य केंद्र सेबी का कॉर्पोरेट एक्शन एडजस्टमेंट (CAA) ढांचा है। यह व्यवस्था बोनस, स्टॉक स्प्लिट या विशेष डिविडेंड जैसे मामलों में डेरिवेटिव सौदों की ‘वैल्यू न्यूट्रैलिटी’ बनाए रखने के लिए बनाई गई थी।
सरल शब्दों में कहें तो कॉर्पोरेट फैसलों से पहले और बाद में ट्रेडर्स की आर्थिक स्थिति समान रहनी चाहिए। अग्रवाल का आरोप है कि एक्सचेंज ने नियमों के अनुरूप प्राइस और क्वांटिटी दोनों समायोजित नहीं किए, बल्कि केवल कीमत में बदलाव किया और डिविडेंड के बराबर राशि सीधे खातों से काट ली।
कानूनी दलील पर सवाल
याचिका में तर्क दिया गया है कि सिक्योरिटीज कॉन्ट्रैक्ट्स (रेगुलेशन) एक्ट के तहत डिविडेंड का अधिकार केवल शेयरधारकों को होता है, डेरिवेटिव ट्रेडर्स को नहीं। ऐसे में खातों से की गई कटौती कानून के दायरे से बाहर बताई गई है। अग्रवाल ने यह भी आरोप लगाया कि उनकी शिकायतों का निस्तारण बिना सुनवाई के कर दिया गया। सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी भी उपलब्ध नहीं कराई गई।
उनके मुताबिक, इससे पूरी प्रक्रिया पर पारदर्शिता को लेकर संदेह पैदा होता है। अब बाजार की निगाहें अदालत की अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जो NSE की लिस्टिंग की दिशा तय कर सकती है।
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