अब इसे इत्तेफाक कहें या कुछ और,पत्नी के जाने के महज पांच दिन बाद ही मिल्खा सिंह ने भी कहा दुनिया को अलविदा

भारत के महान धावक मिल्खा सिंह अब इस दुनिया में नहीं रहे। चंडीगढ़ के पीजीआई अस्पताल में बीते 18 जून को उन्होंने अपनी आखिरी सांस ली और 91 साल की उम्र में इस दुनिया को हमेशा-हमेशा के लिए अलविदा कह दिया। इस खबर के सामने आते ही खेल जगत से लेकर पूरे देश में शोक की लहर दौड़ गई। आज भी पूरे देश की आंखें नम हैं, क्योंकि उन्होंने मिल्खा सिंह को खो दिया है पर मिल्खा सिंह खुद अपनी पत्नी के बग़ैर रह नहीं सकते थे उनका प्रेम ऐसा था कि बीते 13 जून को उनकी पत्नी और वॉलीबॉल की पूर्व भारतीय कप्तान निर्मल कौर का निधन हुआ तो उसके पांच दिन बाद यानि 18 जून को मिल्खा सिंह ने भी दुनिया से अलविदा कह दिया दोनों लगभग 59 साल तक साथ में रहे और मौत ही दोनों को अलग कर पाई.

अब इसे इत्तेफाक कहें या कुछ और-

शायद ही लोग मिल्खा सिंह और निर्मल कौर की प्रेम कहानी के बारे में न जानते हों। फिर भी हम बताते हैं कि आखिर क्या थी निर्मल कौर और मिल्खा सिंह की प्रेम कहानी मिल्खा सिंह की पत्नी का नाम निर्मल कौर था अब इसे इत्तेफाक कहें या कुछ और, लेकिन पत्नी के जाने के महज पांच दिन के अंतराल पर ही मिल्खा सिंह भी इस दुनिया को अलविदा कह बैठे। पहले निर्मल कौर और अब मिल्खा सिंह करोड़ों लोगों की आंखें नम कर गए और पीछे छोड़ गए सिर्फ यादें।

निर्मल को देखते ही अपना दिल दे बैठे थे मिल्खा –

श्रीलंका के कोलंबो में साल 1955 में भारत की वॉलीबॉल खिलाड़ी और टीम की कप्तान निर्मल कौर से मिल्खा सिंह की पहली मुलाकात हुई थी। मिल्खा सिंह और निर्मल कौर, दोनों ही कोलंबो में एक टूर्नामेंट में हिस्सा लेने पहुंचे थे। यहां एक भारतीय बिजनेसमैन ने टीम के लिए डिनर आयोजित किया था, तो इस पार्टी में ही मिल्खा सिंह ने निर्मल कौर को देखा था और देखते ही वो उन्हें अपना दिल दे बैठे थे

मिल्खा सिंह और निर्मल कौर की मोहब्बत-

अपने एक इंटरव्यू में उन्होंने इस बात का जिक्र करते हुए कहा था कि, निर्मन को देखते ही मैंने पसंद कर लिया था। हमारे बीच काफी बातें भी हुईं। हालांकि, पास में कोई कागज नही था, तो मैंने निर्मल के हाथ पर होटल का नंबर लिख दिया था।
इसके बाद साल 1958 में दोनों की मुलाकात फिर से हुई, लेकिन प्यार की गाड़ी ने चलना तो 1960 में शुरू किया। जब दोनों की मुलाकात दिल्ली के नेशनल स्टेडियम में हुई। इसके बाद सिलसिला आगे बढ़ता गया, और इसके बाद प्यार का इजहार भी हो चुका था। ऐसे में अब इस रिश्ते को एक नाम देना बचा था यानी शादी करना।

मुख्यमंत्री प्रताप सिंह कैरों मसीहा बनकर आये थे सामने-

1960 तक मिल्खा सिंह एक बड़ा नाम हो चुके थे। लेकिन उनकी शादी में अड़चन उनके ससुर ही बन रहे थे, क्योंकि वो इस रिश्ते के लिए तैयार नहीं थे। इसके पीछे की वजह थी धर्म, क्योंकि जहां मिल्खा सिंह सिख परिवार से नाता रखते थे, तो वहीं निर्मल हिंदू परिवार से आती थी। ऐसे में शादी में अड़चन आना स्वाभाविक था लेकिन वो कहते हैं न कि जोड़ियां तो रब के घर से बनकर आती हैं। ऐसे में इन्हें बनाने या बिगाड़ने वाले हम कौन होते हैं।इसलिए उस वक्त मिल्खा सिंह और निर्मल कौर की शादी के लिए पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रताप सिंह कैरों मसीहा बनकर सामने आए। उन्होंने परिवार वालों को समझाया, जिसके बाद साल 1962 में दोनों शादी के पवित्र बंधन में बंध गए।

सबसे बड़ी ताकत थी निर्मल –

मिल्खा सिंह अपनी पत्नी की तारीफ करते हुए कई बार सार्वजनिक तौर पर कह चुके थे कि वे खुद 10वीं पास हैं, लेकिन बच्चों को पढ़ाने और संस्कार देने में उनकी पत्नी निर्मल का ही अहम रोल रहा है। मिल्खा सिंह अपनी पत्नी निर्मल को सबसे बड़ी ताकत मानते थे।

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