North Bengal : उत्तर बंगाल में इस बार विधानसभा चुनाव की तस्वीर काफी हद तक आदिवासी मतदाताओं के रुख पर निर्भर करती दिख रही है। Darjeeling, Jalpaiguri और Alipurduar जैसे जिलों में इनकी भूमिका बेहद अहम है। कई सीटों पर जीत-हार का फैसला सीधे तौर पर इसी वर्ग के वोट से तय होता है। उत्तर बंगाल की 54 विधानसभा सीटों में से 16 सीटें आदिवासी समुदाय के लिए आरक्षित हैं। यही वजह है कि Bharatiya Janata Party और All India Trinamool Congress दोनों ने इस वोट बैंक पर पूरा जोर लगा दिया है। इस बार मुख्य मुकाबला भी इन्हीं दो दलों के बीच माना जा रहा है।
पिछले चुनाव में तराई और डुवार्स क्षेत्र में तृणमूल कांग्रेस को बड़ा झटका लगा था। कई आदिवासी बहुल सीटें भाजपा के खाते में चली गई थीं। इस बार पार्टी ने उस नुकसान की भरपाई के लिए अपनी रणनीति बदल दी है और सीधे आदिवासी चेहरों को मैदान में उतारकर समीकरण साधने की कोशिश की है।
North Bengal में आदिवासी वोट की जंग
तृणमूल ने जलपाईगुड़ी की माल सीट से बुलूचिक बड़ाइक, नागराकाटा से संजय कुजूर और अलीपुरद्वार के अलग-अलग क्षेत्रों से जयप्रकाश टोप्पो, राजीव तिर्की और वीरेंद्र बाड़ा को उम्मीदवार बनाया है। वहीं, फांसीदेवा से रीना टोप्पो एक्का को टिकट देकर महिला प्रतिनिधित्व को भी महत्व दिया गया है। यह साफ संकेत है कि पार्टी जमीनी पकड़ मजबूत करना चाहती है। दूसरी ओर भाजपा ने पिछले चुनाव में इन इलाकों में शानदार प्रदर्शन किया था। Manoj Tigga जैसे नेता लोकसभा तक पहुंचे, जबकि कई विधानसभा सीटों पर भी भाजपा ने जीत दर्ज की। ऐसे में यह क्षेत्र पार्टी के लिए मजबूत आधार बना हुआ है, जिसे वह किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहती।
केंद्र में आदिवासियों के बने मुद्दे
इस चुनाव में आदिवासी समुदाय के मुद्दे भी केंद्र में हैं। जमीन के अधिकार, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं, साथ ही स्थानीय रोजगार की मांग लंबे समय से उठती रही है। इन मुद्दों पर दोनों पार्टियां अपने-अपने तरीके से वादे कर रही हैं। डुवार्स क्षेत्र में चाय बागान मजदूरों की स्थिति सबसे बड़ी चिंता बनी हुई है। मजदूरी, बोनस, पीएफ और ग्रेच्युटी जैसी सुविधाओं को लेकर लंबे समय से असंतोष है। कई जगह महीनों तक वेतन नहीं मिलने की शिकायतें भी सामने आती रही हैं।
उत्तर बंगाल का चुनाव इस बार पूरी तरह आदिवासी वोट बैंक के इर्द-गिर्द घूमता नजर आ रहा है। अब देखना होगा कि तृणमूल की नई रणनीति रंग लाती है या भाजपा अपनी पकड़ बनाए रखने में सफल रहती है। चुनावी नतीजे ही इस सियासी जंग का असली फैसला करेंगे।
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