Nepal Election : नेपाल में आज मतदान जारी है और इस बार का चुनाव सामान्य राजनीतिक मुकाबले से कहीं ज्यादा अहम माना जा रहा है। राजधानी काठमांडू समेत कई बड़े शहरों में माहौल बदला-बदला दिखाई दे रहा है। खासतौर पर युवाओं की नई पीढ़ी यानी जेन-जेड मतदाता पारंपरिक नेताओं और पुराने राजनीतिक ढांचे से नाराज नजर आ रहे हैं। लंबे समय से सत्ता में रहे नेताओं के खिलाफ सोशल मीडिया से लेकर सड़कों तक असंतोष देखने को मिल रहा है। इसके बावजूद अनुभवी नेता केपी शर्मा ओली अब भी देश की स्थापित राजनीति के सबसे मजबूत चेहरों में गिने जा रहे हैं।
इस चुनाव का सबसे ज्यादा चर्चित मुकाबला झापा-5 सीट पर माना जा रहा है। यह सीट वर्षों से ओली का मजबूत गढ़ रही है, लेकिन इस बार यहां अलग तरह की राजनीतिक टक्कर देखने को मिल रही है।
Nepal Election में नया मोड़
काठमांडू के लोकप्रिय मेयर बालेन शाह ने सीधे तौर पर ओली को चुनौती दे दी है। माना जा रहा है कि यह मुकाबला सिर्फ एक सीट का नहीं बल्कि पुरानी और नई राजनीति के बीच टकराव का प्रतीक बन गया है। चुनावी विश्लेषकों की नजर भी खासतौर पर इसी सीट के नतीजों पर टिकी हुई है। पिछले साल सितंबर में नेपाल में युवाओं के बड़े प्रदर्शन देखने को मिले थे। उस समय देश में भ्रष्टाचार, बढ़ती बेरोजगारी और सोशल मीडिया पर प्रतिबंध जैसे मुद्दों को लेकर हजारों युवा सड़कों पर उतर आए थे। इन प्रदर्शनों के दौरान पुलिस कार्रवाई में कई लोगों की मौत भी हुई, जिससे सरकार पर काफी दबाव बना। उस समय ओली सत्ता में थे और विरोध इतना तेज था कि कई लोगों को लगा उनका राजनीतिक सफर अब खत्म हो सकता है। लेकिन इसके बावजूद वे एक बार फिर चुनावी मैदान में उतर चुके हैं।
विद्रोही छात्र से राष्ट्रीय नेता तक का सफर
1952 में जन्मे केपी शर्मा ओली का राजनीतिक सफर काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा है। किशोरावस्था में ही वे कम्युनिस्ट विचारधारा से प्रभावित हो गए थे। 1970 के दशक में नेपाल में राजतंत्र के खिलाफ चल रहे आंदोलनों में उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई। झापा विद्रोह से जुड़े मामलों में 1973 में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और करीब 14 साल जेल में बिताने पड़े। इन्हीं संघर्षों ने उनकी राजनीतिक पहचान को मजबूत बनाया और बाद में वही नेता देश की सत्ता के शीर्ष तक पहुंच गया।
बयान से बनाई अलग पहचान
1990 के जनआंदोलन के बाद जब नेपाल में बहुदलीय लोकतंत्र बहाल हुआ तो ओली ने खुलकर राजनीति में कदम रखा। कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (यूएमएल) के नेता के तौर पर वे संसद में पहुंचे। उनकी छवि ऐसे नेता की रही जो सीधे और तीखे अंदाज में बोलने के लिए जाने जाते हैं। विरोधियों पर कटाक्ष और व्यंग्य करना उनकी खास शैली मानी जाती है। इसी वजह से वे नेपाल की गठबंधन राजनीति में लंबे समय तक प्रभावशाली बने रहे।
राष्ट्रवादी राजनीति
नेपाल की राष्ट्रीय राजनीति में ओली का प्रभाव सबसे ज्यादा 2015 के बाद बढ़ा। उसी समय नया संविधान लागू हुआ और भारत के साथ संबंधों में तनाव पैदा हो गया। सीमा पर विरोध प्रदर्शनों के कारण कई महीनों तक जरूरी सामान की आपूर्ति प्रभावित रही। नेपाल में इसे अनौपचारिक नाकाबंदी के रूप में देखा गया। ओली ने इस पूरे मुद्दे को राष्ट्रीय स्वाभिमान से जोड़ दिया, जिससे उन्हें जनता का व्यापक समर्थन मिला।
सत्ता संघर्ष और संवैधानिक संकट
हालांकि बाद के वर्षों में उनकी अपनी ही पार्टी के भीतर असंतोष बढ़ने लगा। दिसंबर 2020 में उन्होंने संसद भंग कर दी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को रद्द कर दिया। इसके बाद मई 2021 में फिर से संसद भंग करने की कोशिश हुई, जिससे देश में संवैधानिक संकट पैदा हो गया। अंततः उन्हें पद छोड़ना पड़ा। अब एक बार फिर चुनावी मैदान में उतरे ओली के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या वे अपनी राजनीतिक पकड़ बरकरार रख पाएंगे या नेपाल की नई पीढ़ी राजनीति की दिशा बदल देगी।
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