Marriage : बैंड, डीजे, महंगे फूल और चमकदार लाइटों के बीच आज की शादियां किसी मेगा इवेंट से कम नहीं दिखतीं। मेहमान सेल्फी में व्यस्त रहते हैं और स्टेज पर रस्में चलती रहती हैं। इसी भागदौड़ में मंडप के नीचे जल रही पवित्र अग्नि और उसके चारों ओर लिए जाने वाले सात फेरों का असली अर्थ पीछे छूट जाता है। अक्सर लोग बस गिनती करते हैं। एक, दो, तीन… सात पूरे हुए और रस्म खत्म। पर असल में यहीं से एक जीवन की शुरुआत होती है।
हिंदू विवाह में ‘सप्तपदी’ यानी सात कदम, एक तरह से वैवाहिक जीवन का संविधान माने जाते हैं। प्राचीन परंपराओं में इन सात फेरों को गृहस्थ जीवन के सात स्तंभ कहा गया है। यह केवल अग्नि की परिक्रमा नहीं, बल्कि दो लोगों का एक-दूसरे के साथ खड़े रहने का सार्वजनिक संकल्प है। हर फेरा एक प्रतिज्ञा है, जो साथ चलने का वादा करता है।
Marriage: 7 फेरे सात जन्मों तक साथ
पहले फेरे में दूल्हा-दुल्हन परिवार के भरण-पोषण और अन्न-धन की वृद्धि का वचन लेते हैं। यह सिर्फ आर्थिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि साझा प्रयास का संकेत है। दूसरे फेरे में मानसिक और शारीरिक मजबूती के साथ मर्यादित जीवन जीने का संकल्प होता है। तीसरे फेरे में ईमानदारी से कमाई और एक-दूसरे के प्रति निष्ठा की शपथ ली जाती है। यही तीन आधार विवाह की नींव को मजबूत करते हैं।
चौथा और पांचवां फेरा
चौथा फेरा बताता है कि जीवन में सुख आए या संकट, दोनों बराबरी से साथ निभाएंगे। यह साझेदारी का सबसे स्पष्ट वादा है। पांचवें फेरे में आने वाली पीढ़ी की जिम्मेदारी स्वीकार की जाती है। बच्चों के पालन-पोषण, अच्छे संस्कार और समाज के प्रति कर्तव्यों को निभाने का संकल्प इसी में शामिल है।
छठा और सातवां फेरा
छठा फेरा उम्र के हर पड़ाव पर एक-दूसरे के स्वास्थ्य और साथ का भरोसा देता है। यह वादा करता है कि समय बदल सकता है, पर साथ नहीं। सातवां और अंतिम फेरा मित्रता का प्रतीक है। इसमें पति-पत्नी ‘सखा’ बनने का वचन देते हैं ऐसे साथी, जो हर परिस्थिति में एक-दूसरे का हाथ थामे रहें। असल में विवाह दो शरीरों का नहीं, दो आत्माओं का साझा सफर है। सात वचन उसी सफर की डोर हैं, जो भीड़ और शोर के बीच भी रिश्ते को थामे रखती हैं।
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