Insurance Complaints : भारतीय बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण (इरडा) की ताजा वार्षिक रिपोर्ट ने बीमा उद्योग की एक गंभीर समस्या को सामने रखा है। रिपोर्ट में साफ तौर पर कहा गया है कि बीमा क्षेत्र में ‘गलत बिक्री’ अब मामूली मुद्दा नहीं रहा, बल्कि यह उपभोक्ता विश्वास के लिए बड़ा खतरा बनता जा रहा है। नियामक संस्था ने बीमा कंपनियों को चेताया है कि वे केवल शिकायतों का निपटारा करने तक सीमित न रहें, बल्कि उनकी जड़ तक पहुंचने के लिए ‘मूल कारण विश्लेषण’ अपनाएं।
रिपोर्ट के मुताबिक, जीवन बीमा कंपनियों के खिलाफ दर्ज कुल शिकायतों की संख्या में कोई बड़ा उतार-चढ़ाव नहीं दिखा है। वित्त वर्ष 2023-24 में जहां यह संख्या 1,20,726 थी, वहीं 2024-25 में यह मामूली घटकर 1,20,429 रह गई। आंकड़े देखने में स्थिर जरूर लगते हैं, लेकिन इसके पीछे छिपी प्रवृत्ति नियामकों के लिए चिंता का कारण बनी हुई है।
Insurance कंपनियों पर बढ़ा दबाव
असल चिंता ‘अनुचित व्यावसायिक व्यवहार’ यानी यूएफबीपी से जुड़ी शिकायतों को लेकर है। इन शिकायतों की संख्या एक साल में 23,335 से बढ़कर 26,667 तक पहुंच गई। कुल शिकायतों में इनकी हिस्सेदारी भी बढ़ी है, जो पहले 19.33 प्रतिशत थी और अब 22.14 प्रतिशत हो चुकी है। यह इशारा करता है कि गलत बिक्री की घटनाएं धीरे-धीरे बढ़ रही हैं। गलत बिक्री का मतलब है ग्राहकों को पूरी और सही जानकारी दिए बिना बीमा पॉलिसी थमा देना।
कई बार शर्तें स्पष्ट नहीं बताई जातीं, जोखिम छिपा लिया जाता है या ग्राहक की जरूरत के अनुरूप न होने के बावजूद पॉलिसी बेच दी जाती है। इसका नतीजा यह होता है कि ग्राहक बाद में खुद को ठगा हुआ महसूस करता है।
बीमा कंपनियों के लिए सख्त सलाह
इरडा ने अपनी रिपोर्ट में बीमा कंपनियों को साफ संदेश दिया है कि उत्पाद की उपयुक्तता का सही आकलन किया जाए। साथ ही एजेंटों और अन्य वितरण चैनलों पर कड़ा नियंत्रण रखने की जरूरत बताई गई है। नियामक का मानना है कि समय-समय पर गलत बिक्री से जुड़ी शिकायतों का विश्लेषण कर, उनकी असल वजह तलाशना बेहद जरूरी है। केवल इरडा ही नहीं, बल्कि वित्त मंत्रालय भी इस मुद्दे को गंभीरता से ले रहा है।
मंत्रालय ने बैंकों और बीमा कंपनियों को बार-बार आगाह किया है कि कॉरपोरेट गवर्नेंस के मानकों से कोई समझौता न किया जाए। खासतौर पर ग्राहकों पर जबरन या भ्रमित करके पॉलिसी थोपना लंबे समय में सेक्टर को नुकसान पहुंचाता है।
पॉलिसी लैप्स का खतरा
गलत बिक्री का सीधा असर ग्राहकों की जेब पर पड़ता है। अनावश्यक या महंगी पॉलिसी के चलते प्रीमियम का बोझ बढ़ जाता है। नतीजतन, कई पॉलिसीधारक नवीनीकरण नहीं कराते और पॉलिसी बंद हो जाती है। यही वजह है कि नियामक अब इस समस्या को जड़ से खत्म करने की तैयारी में जुट गया है।
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