Health Tips : आजकल ज्यादातर लोग दिन भर की थकान के बाद जैसे ही बिस्तर पर जाते हैं, सबसे पहले मोबाइल फोन हाथ में उठा लेते हैं। शुरुआत अक्सर यह सोचकर होती है कि बस कुछ मिनट सोशल मीडिया देखेंगे, लेकिन कब आधा या एक घंटा निकल जाता है, इसका अंदाजा ही नहीं लगता। इस आदत को अब ‘डूम-स्क्रॉलिंग’ कहा जाने लगा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह आदत धीरे-धीरे नींद और मानसिक स्वास्थ्य दोनों को प्रभावित कर रही है।
डॉक्टरों के अनुसार, हमारा शरीर एक प्राकृतिक जैविक घड़ी के हिसाब से चलता है। शाम ढलते ही दिमाग में ऐसा हार्मोन बनने लगता है जो शरीर को आराम और नींद के लिए तैयार करता है।
Health Tips: रात में फोन स्क्रॉल करना पड़ रहा भारी
स्मार्टफोन और टैबलेट की स्क्रीन से निकलने वाली नीली रोशनी इस प्रक्रिया को बाधित कर देती है। नतीजतन शरीर को सही संकेत नहीं मिल पाता और व्यक्ति देर तक जागता रहता है, भले ही वह थका हुआ क्यों न हो। सोने से पहले दिमाग को शांत होना चाहिए, लेकिन लगातार स्क्रीन देखने से ठीक उलटा असर पड़ता है। सोशल मीडिया या न्यूज फीड में अक्सर बहस, विवाद या चौंकाने वाली खबरें सामने आती हैं। इन्हें देखते-देखते दिमाग सक्रिय हो जाता है और सोचने-समझने की प्रक्रिया तेज हो जाती है। ऐसे में शरीर बिस्तर पर होता है, लेकिन दिमाग पूरी तरह जाग्रत स्थिति में बना रहता है।
नकारात्मक कंटेंट से बढ़ता है तनाव
डूम-स्क्रॉलिंग का एक बड़ा नुकसान यह भी है कि इसमें अक्सर नकारात्मक खबरें या तुलना पैदा करने वाला कंटेंट सामने आता है। दुर्घटनाएं, युद्ध या दूसरों की चमकदार जिंदगी से जुड़े पोस्ट देखने पर व्यक्ति के भीतर चिंता और असुरक्षा की भावना पैदा हो सकती है। इससे शरीर में तनाव से जुड़ा हार्मोन बढ़ने लगता है, जिसका असर नींद की गुणवत्ता पर पड़ता है। ऐसे में सुबह उठने पर भी थकान महसूस होती है। विशेषज्ञों का कहना है कि कुछ आसान बदलाव अपनाकर इस आदत को कम किया जा सकता है। सबसे पहला कदम यह है कि सोने से कुछ समय पहले फोन का इस्तेमाल बंद कर दिया जाए। इसके अलावा अलार्म के लिए मोबाइल की जगह अलग घड़ी का उपयोग करना भी मददगार हो सकता है, ताकि फोन बिस्तर के पास न रखा जाए।
स्क्रीन की जगह अपनाएं बेहतर विकल्प
अगर सोने से पहले कुछ करने की आदत हो तो मोबाइल की जगह किताब पढ़ना, हल्का संगीत सुनना या कुछ मिनट ध्यान करना बेहतर विकल्प हो सकते हैं। यदि फोन इस्तेमाल करना जरूरी ही हो, तो स्क्रीन की तेज रोशनी कम करने वाले नाइट मोड का इस्तेमाल किया जा सकता है। विशेषज्ञों के मुताबिक, इन छोटे कदमों से नींद की गुणवत्ता में काफी सुधार देखा जा सकता है।
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