Beijing Model : दिल्ली-एनसीआर की सर्द सुबह सिर्फ ठंड होने के साथ-साथ जहरीली भी हो चुकी है। इससे आंखों में जलन, गले में खराश और सांस लेने में दिक्कत आम हो गई है। AQI मीटर लगातार खतरनाक निशान के आसपास अटका है। सड़कें, इमारतें और आसमान धूल व धुएं की मोटी परत में छिपे हैं। ऐसे हालात में हर किसी के मन में यही सवाल उठता है कि क्या दिल्ली की हवा कभी साफ हो पाएगी? ऐसे में मौसम विभाग के साथ-साथ राज्य सरकार भी लगातार एक-से-बढ़कर-एक कदम उठा रही है। इसी बीच चर्चाओं में इन दिनों बीजिंग मॉडल आ चुका है, जिसके बारे में बहुत कम लोगों को पता है। तो आज के आर्टिकल में हम आपको इसी के बारे में विस्तारपूर्वक जानकारी देने वाले हैं। इससे आपके मन में चल रही सारी दुविधाएं दूर हो जांएगी। साथ ही आपको सारे समीकरण आसानी से समझ आ जाएंगे।
आज भले ही बीजिंग की हवा साफ नजर आती हो, लेकिन एक दशक पहले हालात बिल्कुल उलट थे। 2007 से 2013 के बीच बीजिंग घने स्मॉग में डूबा रहता था। 2013 में AQI 755 तक पहुंच गया था, जिसे उस समय दुनिया के सबसे खराब आंकड़ों में गिना गया। विदेशी मीडिया ने बीजिंग को स्मॉग सिटी का तमगा दे दिया था और निवेशक तक वहां से दूरी बनाने लगे थे।
Beijing Model के लिए अपनाई सख्त नीति
प्रदूषण चीन के लिए पर्यावरण के साथ-साथ वैश्विक छवि का संकट बन गया था। हालात इतने बिगड़े कि अमीर चीनी परिवार देश छोड़ने पर विचार करने लगे। यहीं से चीन ने फैसला किया कि अब आधे-अधूरे कदम नहीं, बल्कि सख्त और लंबे समय तक चलने वाली नीति अपनानी होगी। साल 2013 में चीन ने वायु प्रदूषण रोकने के लिए एक ठोस पांच वर्षीय कार्ययोजना शुरू की। बीजिंग-तियानजिन-हेबेई क्षेत्र में PM2.5 घटाने के स्पष्ट लक्ष्य तय किए गए। उद्योगों, ईंधन गुणवत्ता और शहरों की प्लानिंग पर कड़े नियम लगाए गए। बाद में ‘ब्लू स्काई प्रोटेक्शन कैंपेन’ ने इन नियमों को और भी कठोर बना दिया गया।
गाड़ियों पर रोक
बीजिंग में वाहनों से निकलने वाले धुएं को सबसे पहले निशाने पर लिया गया। पुराने और ज्यादा प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों को सड़कों से हटाया गया। लाइसेंस प्लेट लॉटरी, ऑड-ईवन और तय दिनों में ड्राइविंग जैसे नियम लागू हुए। साथ ही, मेट्रो और बस नेटवर्क को इतना मजबूत किया गया कि निजी गाड़ी की जरूरत कम पड़े। चीन ने इलेक्ट्रिक गाड़ियों को तेजी से बढ़ावा दिया। बसें, टैक्सियां और सरकारी वाहन बड़े पैमाने पर इलेक्ट्रिक किए गए। इससे ईंधन जलने से होने वाला प्रदूषण काफी हद तक कम हुआ। केवल इतना ही नहीं, बीजिंग का पब्लिक ट्रांसपोर्ट दुनिया के सबसे बड़े नेटवर्क में शामिल हो गया।
बीजिंग के चारों ओर बड़े ग्रीन बेल्ट, जंगल और पार्क विकसित किए गए। इससे धूल भरी आंधियों पर लगाम लगी और शहर को प्राकृतिक फिल्टर मिला। बता दें कि हरियाली ने हवा की गुणवत्ता सुधारने में अहम भूमिका निभाई।
क्या दिल्ली में चलेगा यह मॉडल
विशेषज्ञ मानते हैं कि बीजिंग और दिल्ली की परिस्थितियां एक जैसी नहीं हैं। चीन की प्रशासनिक सख्ती और भारत के लोकतांत्रिक ढांचे में बड़ा फर्क है। फिर भी कुछ कदम ऐसे हैं, जो दिल्ली में तुरंत अपनाए जा सकते हैं। जिसमें कंस्ट्रक्शन धूल पर सख्ती, कचरा जलाने पर पूरी रोक, मौसम के पूर्वानुमान के हिसाब से एक्शन प्लान और पूरे एनसीआर में एक जैसे नियम शामिल है। बता दें कि यह नियम तभी काम करते हैं, जब सरकार और जनता दोनों साथ चलें। तभी यह शहर फिर से खुलकर सांस ले पाएगा।
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