Chardham Yatra 2026 : उत्तराखंड में होने वाली चारधाम यात्रा को लेकर परिवहन व्यवस्था की तैयारियां अब तेज हो गई हैं। यात्रियों को सुरक्षित और व्यवस्थित तरीके से धामों तक पहुंचाने के लिए संयुक्त रोटेशन यातायात व्यवस्था समिति ने अपनी प्रक्रिया शुरू कर दी है। जानकारी के मुताबिक, अप्रैल के पहले सप्ताह में बसों के चयन के लिए लॉटरी निकाली जाएगी। इसी लॉटरी के आधार पर यह तय होगा कि कौन-सी बसें चारधाम यात्रा मार्ग पर चलेंगी और कौन-सी स्थानीय रूट पर सेवाएं देंगी।
संयुक्त रोटेशन समिति हर साल बसों को यात्रा रूट पर भेजने के लिए लॉटरी प्रणाली अपनाती है। इस प्रक्रिया में बसों के नंबर निकाले जाते हैं और उसी क्रम में वाहनों को धामों की यात्रा के लिए भेजा जाता है।
Chardham Yatra 2026
समिति के अध्यक्ष भास्करानंद भारद्वाज के अनुसार इस बार भी यही व्यवस्था लागू रहेगी। उन्होंने बताया कि समिति के पास करीब 2200 से ज्यादा बसें उपलब्ध हैं, जिनमें से लगभग 60 प्रतिशत बसों को चारधाम यात्रा मार्ग पर लगाया जाएगा, जबकि 40 प्रतिशत बसें स्थानीय यात्रियों की सुविधा के लिए क्षेत्रीय रूटों पर चलती रहेंगी।
इन तारीखों से शुरू होगी चारधाम यात्रा
चारधाम यात्रा की शुरुआत इस वर्ष अप्रैल के तीसरे सप्ताह से होने जा रही है। सबसे पहले 19 अप्रैल को गंगोत्री और यमुनोत्री धाम के कपाट श्रद्धालुओं के लिए खोले जाएंगे। इसके बाद 22 अप्रैल को केदारनाथ और 23 अप्रैल को बदरीनाथ धाम के कपाट खुलेंगे। इन तिथियों को ध्यान में रखते हुए परिवहन कंपनियां अभी से अपनी तैयारियां अंतिम रूप देने में जुटी हैं, ताकि यात्रा के दौरान यात्रियों को किसी तरह की परेशानी का सामना न करना पड़े।
चारधाम यात्रा के दौरान बस संचालन की पूरी जिम्मेदारी संयुक्त रोटेशन व्यवस्था के तहत चलने वाली दस परिवहन कंपनियों के पास रहती है। इनमें जीएमओयू, टीजीएमओ, यातायात, सीमांत सहकारी संघ, गढ़वाल मंडल कांट्रैक्ट कैरिज, रूपकुंड पर्यटन विकास संघ, दून वैली कांट्रैक्ट कैरिज, गढ़वाल मंडल बहुद्देश्यीय और यूजर्स रामनगर समेत हरिद्वार कांट्रैक्ट कैरिज जैसी कंपनियां शामिल हैं। हरिद्वार और ऋषिकेश से बड़ी संख्या में बसें यात्रियों को चारों धामों की ओर ले जाती हैं।
1971 में शुरू हुई थी संयुक्त रोटेशन व्यवस्था
चारधाम यात्रा में बस संचालन को व्यवस्थित रखने के लिए संयुक्त रोटेशन व्यवस्था की शुरुआत वर्ष 1971 में की गई थी। तब से अधिकांश वर्षों में यही प्रणाली लागू की जाती रही है। हालांकि कुछ अवसर ऐसे भी आए जब यह व्यवस्था पूरी तरह लागू नहीं हो सकी। उदाहरण के तौर पर 1998 में संयुक्त रोटेशन का गठन नहीं हो पाया था, जबकि 2013 में कुछ कंपनियों ने इससे दूरी बना ली थी। उसी वर्ष आई भीषण आपदा के कारण यात्रा भी प्रभावित हो गई थी।
समय के साथ बढ़ रही हैं चुनौतियां
वर्तमान समय में स्थानीय परिवहन कंपनियों के सामने नई चुनौतियां भी खड़ी हो रही हैं। बाहरी राज्यों से आने वाले व्यावसायिक वाहन और निजी कारों की संख्या बढ़ने से स्थानीय बस संचालकों को आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ रहा है। ऋषिकेश और आसपास के क्षेत्रों में परिवहन कारोबार काफी हद तक मई और जून में होने वाली यात्रा पर ही निर्भर करता है। यही वजह है कि परिवहन कंपनियां लंबे समय से अवैध या डग्गामार वाहनों पर रोक लगाने की मांग भी उठाती रही हैं।
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