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Aravalli Row: अरावली रेंज की सुरक्षा का मामला फिर पहुंचा सुप्रीम कोर्ट, समीक्षा की मांग की गई

Aravalli Row
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Aravalli Row : अरावली पर्वत श्रृंखला से जुड़े पर्यावरण सुरक्षा उपायों को कमजोर किए जाने का मामला एक बार फिर देश की सर्वोच्च अदालत यानी कि सुप्रम कोर्ट तक पहुंच गया है। बता दें कि पर्यावरण कार्यकर्ता और वकील हितेंद्र गांधी ने मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत को पत्र लिखकर 100-मीटर टेस्ट के नाम से चर्चित नियम की समीक्षा की मांग की है। दरअसल, उनका कहना है कि इस नियम से अरावली के बड़े हिस्से को कानूनी सुरक्षा से बाहर किया जा सकता है। इसके लिए हितेंद्र गांधी ने अपने पत्र की प्रति राष्ट्रपति को भी भेजी है।

उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले पर पुनर्विचार की मांग की है, जिसमें पर्यावरण मंत्रालय की ओर से प्रस्तावित अरावली की नई परिभाषा को मंजूरी दी गई थी। अब सबकी नजर इस बात पर है कि सुप्रीम कोर्ट इस अपील पर क्या रुख अपनाता है।

Aravalli Row : नई परिभाषा

नई परिभाषा के मुताबिक, नामित अरावली जिलों में वह भू-आकृति ‘अरावली पहाड़ी’ मानी जाएगी, जिसकी ऊंचाई अपने आसपास के भू-भाग से 100 मीटर या उससे अधिक हो। वहीं, अरावली रेंज का मतलब ऐसी दो या अधिक पहाड़ियों से है, जो एक-दूसरे से 500 मीटर की दूरी के भीतर हों। पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि यह परिभाषा अरावली क्षेत्र के लगभग 90 प्रतिशत हिस्से को सुरक्षा दायरे से बाहर कर सकती है। उनका दावा है कि कई ऐसी पहाड़ियां और भू-भाग हैं, जो ऊंचाई के इस मानक पर खरे नहीं उतरते, लेकिन जल संरक्षण, जैव विविधता और जलवायु संतुलन के लिहाज से बेहद अहम हैं।

100-मीटर नियम पर सवाल

हितेंद्र गांधी ने अपने पत्र में साफ कहा है कि केवल ऊंचाई के आधार पर प्रकृति का मूल्यांकन करना खतरनाक हो सकता है। निचली पहाड़ियां, जल रिचार्ज ज़ोन और हरित क्षेत्र, जो स्थानीय इकोसिस्टम को संभालते हैं, इस नियम के चलते अनदेखे रह सकते हैं। गांधी ने 20 नवंबर 2025 को आए सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला देते हुए अपील की है कि अरावली की पहचान के लिए अपनाए गए फ्रेमवर्क को या तो दोबारा देखा जाए या उसे और स्पष्ट किया जाए। उनका कहना है कि मौजूदा मानदंड उत्तर-पश्चिम भारत में पर्यावरण संरक्षण को कमजोर कर सकते हैं।

संविधान के प्रावधानों का दिया हवाला

अपनी अपील में गांधी ने संविधान के अनुच्छेद 21 का जिक्र किया है, जो नागरिकों को स्वस्थ पर्यावरण का अधिकार देता है। इसके अलावा अनुच्छेद 48A और 51A(g) का भी उल्लेख किया गया है, जो राज्य और नागरिकों पर पर्यावरण की रक्षा का दायित्व तय करते हैं>

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