Aghori : अघोर पंथ का नाम सुनते ही लोगों के मन में डर, रहस्य और कौतूहल पैदा हो जाता है जबकि अघोर शब्द का शाब्दिक अर्थ जो घोर नहीं है यानी सरल, सहज और भेदभाव से मुक्त हो जाना है। अघोरी मानते हैं कि इस संसार में कुछ भी अशुद्ध या अपवित्र नहीं है। उनके लिए जीवन और मृत्यु, सुंदरता और कुरूपता सब एक ही सत्य के अलग-अलग रूप हैं। अघोरी भगवान शिव के उग्र लेकिन करुणामय भैरव स्वरूप के उपासक होते हैं। वे मानते हैं कि शिव श्मशान में वास करते हैं। जहां आम इंसान मृत्यु से भागता है, वहीं अघोरी उसे जीवन का सबसे बड़ा सत्य मानकर स्वीकार करते हैं।
अघोरी बनना अचानक लिया गया फैसला नहीं होता। इसके लिए वर्षों की कठोर साधना जरूरी मानी जाती है। मान्यता है कि किसी व्यक्ति को पूर्ण अघोरी बनने के लिए करीब 12 वर्षों तक कठिन तप करना पड़ता है। इस दौरान वह गुरु के सान्निध्य में रहकर आत्मसंयम, त्याग और अघोर विद्या की बारीकियां सीखता है।
Aghori पंथ की रहस्यमयी दुनिया
अघोर मार्ग पर चलने की पहली शर्त मोह-माया का त्याग है। अघोरी अपने परिवार, समाज और पहचान से नाता तोड़ लेते हैं। कई परंपराओं में तो वे जीवित रहते हुए ही अपना पिंडदान कर देते हैं, जिसका अर्थ होता है कि वे सांसारिक रूप से स्वयं को मृत मान चुके हैं। अघोर पंथ में गुरु का स्थान सर्वोपरि होता है। बिना गुरु की अनुमति और मार्गदर्शन के इस मार्ग पर कदम रखना संभव नहीं माना जाता। गुरु ही तय करता है कि शिष्य मानसिक और आध्यात्मिक रूप से इस कठिन साधना के लिए तैयार है या नहीं।
श्मशान को घर मानने की परंपरा
अघोरी प्रायः श्मशान घाटों में निवास करते हैं। उनका मानना है कि यही वह स्थान है जहां जीवन और मृत्यु का अंतर मिट जाता है। श्मशान में रहकर वे अहंकार, डर और आसक्ति को समाप्त करने की साधना करते हैं। अघोरी अपने शरीर पर चिता की राख लगाते हैं, जो नश्वर शरीर की याद दिलाती है। साथ ही वे नरमुंड यानी मानव खोपड़ी का उपयोग पात्र के रूप में करते हैं।
भोजन और शुद्ध-अशुद्ध की सीमा से परे
अघोरी भोजन में किसी तरह का भेदभाव नहीं करते। वे समाज द्वारा अपवित्र मानी जाने वाली चीजों को भी ग्रहण कर सकते हैं। इसका उद्देश्य यही होता है कि मन से द्वैत की भावना मिटे और हर वस्तु में एक ही ब्रह्म का दर्शन हो सके। अघोरी देखने में भले ही भयावह लगें, लेकिन उनके जीवन का उद्देश्य डर फैलाना नहीं होता। वे उस सत्य को जीते हैं, जिससे आम इंसान आंखें चुरा लेता है। अघोर पंथ दरअसल जीवन, मृत्यु और चेतना के बीच की दीवार को तोड़ने का कठिन लेकिन गहन आध्यात्मिक मार्ग है।
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