Rajasthan Politics : राजस्थान में स्थानीय निकाय चुनाव को लेकर सियासी गतिविधियां तेज हो गई हैं। बीजेपी समेत तमाम दल और निर्दलीय प्रत्याशी मतदाताओं तक पहुंच बनाने में जुटे हैं। चुनावी प्रचार में विकास, स्थानीय समस्याओं और सरकार के कामकाज को मुद्दा बनाने के साथ प्रत्याशी अब ऐसे तरीकों का भी सहारा ले रहे हैं, जो सीधे लोगों से जुड़ जाएं। बीजेपी के नेता और कार्यकर्ता वार्ड स्तर तक प्रचार कर रहे हैं। कहीं जनसंपर्क के दौरान लोगों की समस्याएं सुनी जा रही हैं तो कहीं प्रत्याशी और नेता जनता के रोजमर्रा के काम में हाथ बंटाते दिखाई दे रहे हैं। इस पूरे माहौल में चुनावी राजनीति के कई दिलचस्प रंग भी सामने आ रहे हैं।
दौसा के बांदीकुई में बीजेपी प्रत्याशी के समर्थन में प्रचार के दौरान विधायक का अलग अंदाज देखने को मिला। वार्ड 22 में प्रत्याशी मोतीलाल के लिए वोट मांगते हुए विधायक की नजर एक बुजुर्ग महिला पर पड़ी, जो खाट पर बैठकर लौकी छील रही थी।
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विधायक ने वहीं बैठकर महिला से बातचीत की और कुछ देर बाद उसके हाथ से चाकू लेकर खुद लौकी छीलने लगे। आसपास मौजूद लोगों ने इसे चुनावी जनसंपर्क का अनोखा अंदाज बताया। इस दौरान बुजुर्ग महिला ने विधायक को नसीहत देते हुए कहा कि काम करेंगे तभी उसका फल मिलेगा। चूरू के सुजानगढ़ में वार्ड 26 का चुनाव भी अपने प्रचार अंदाज के कारण चर्चा में है। निर्दलीय प्रत्याशी करणीदान को चुनाव चिह्न के तौर पर गोभी का फूल मिला है। प्रत्याशी ने इसी चुनाव चिह्न को अपनी ताकत बना लिया और प्रचार में गोभी के फूल को लेकर मतदाताओं के बीच पहुंच रहे हैं। वह अपने चुनाव चिह्न को कमल के फूल से भी भारी बताते हुए वोट मांग रहे हैं। प्रचार के दौरान लोगों को गोभी के फूल बांटने का सिलसिला भी शुरू किया गया है।
चोरी ने बढ़ाया सस्पेंस
अजमेर से चुनावी मौसम के बीच आलू-प्याज की बोरियां चोरी होने की खबर ने भी लोगों का ध्यान खींचा है। घटना के सीसीटीवी फुटेज में संदिग्ध नजर आने की बात कही जा रही है। अब इसे लेकर चुनावी माहौल में तरह-तरह की चर्चाएं भी हैं। स्थानीय स्तर पर मजाकिया अंदाज में सवाल उठ रहा है कि कहीं किसी प्रत्याशी के चुनाव चिह्न की जरूरत पूरी करने के लिए तो आलू-प्याज की तरफ हाथ नहीं बढ़ाया गया। बाड़मेर में चुनावी प्रचार के दौरान राजनीतिक पाला बदलने का मामला सामने आया। वार्ड 8 से आरएलपी प्रत्याशी अशोक आचार्य प्रचार के दौरान बीजेपी नेताओं के संपर्क में आए।
इसके बाद उन्होंने आरएलपी का पटका उतारकर बीजेपी का दुपट्टा पहन लिया। मौके पर मौजूद समर्थकों ने नारेबाजी के साथ उनका स्वागत किया। इस घटनाक्रम को बीजेपी की स्थानीय चुनावी रणनीति के लिहाज से अहम माना जा रहा है।
नाम वापसी को लेकर भी हुआ था विवाद
बाड़मेर में इससे पहले नामांकन वापसी के दौरान भी राजनीतिक खींचतान देखने को मिली थी। आरएलपी समर्थकों ने अपने प्रत्याशी का नामांकन वापस लिए जाने को रोकने की कोशिश की थी। मौके पर काफी विवाद हुआ। बाद में प्रत्याशी कार्यालय के भीतर पहुंच गया और घटनाक्रम ने स्थानीय चुनाव की गर्मी को और बढ़ा दिया। इसके बाद उसी खेमे से जुड़े कार्यकर्ता का बीजेपी के साथ आना चर्चा का विषय बन गया। ब्यावर में वार्ड 50 से चुनाव मैदान में उतरीं कविता तिवारी ने प्रचार के दौरान अपने पति का जिक्र करते हुए मतदाताओं से समर्थन मांगा।
उन्होंने कहा कि वह खुद ज्यादा घर से बाहर नहीं निकलतीं, इसलिए लोग उन्हें शायद कम जानते हों, लेकिन उनके पति को इलाके में लोग अच्छी तरह पहचानते हैं। वहीं कोटा में बीजेपी प्रत्याशी सोमा अहलूवालिया ने भी अपने पति के पार्षद रहते किए गए कामों का हवाला देते हुए कहा कि जो काम अधूरे रह गए हैं, उन्हें वह आगे पूरा कराने की कोशिश करेंगी।
जूस की दुकान पर भी दिखा चुनावी रंग
जनसंपर्क के दौरान प्रत्याशी और नेता जनता के बीच सहज दिखने की कोशिश कर रहे हैं। इसी क्रम में कोटा में बीजेपी प्रत्याशी ने जूस की दुकान पर पहुंचकर खुद जूस तैयार किया और कार्यकर्ता को पिलाया। ऐसे छोटे-छोटे दृश्य चुनावी प्रचार में मतदाताओं के साथ सीधा जुड़ाव दिखाने के लिए इस्तेमाल किए जा रहे हैं। नागौर में वरिष्ठ नेता रिछपाल मिर्धा ने प्रचार के दौरान अपने राजनीतिक सफर से जुड़े किस्से सुनाकर सभा में माहौल हल्का कर दिया। उन्होंने अपने शुरुआती दिनों से लेकर पहला विधानसभा चुनाव लड़ने तक की कहानी साझा की। मिर्धा ने परिवारवाद के सवाल का जिक्र करते हुए बताया कि उन्हें कभी परिवार के किसी सदस्य को वार्ड चुनाव लड़ाने का प्रस्ताव मिला था, लेकिन उन्होंने इसके बजाय स्थानीय व्यक्ति को मौका देने की बात कही।
लंबी तैयारी का संदेश
मिर्धा ने सभा में मौजूद नेताओं और कार्यकर्ताओं से कहा कि विधानसभा और लोकसभा चुनाव में अभी काफी समय है, इसलिए संगठन को मजबूत करने और जनता के बीच काम करने का पर्याप्त मौका है। उन्होंने स्थानीय समस्याओं का जिक्र करते हुए भरोसा दिलाया कि आचार संहिता खत्म होने के बाद जनता से जुड़े मुद्दों को उठाया जाएगा। राजस्थान में स्थानीय चुनाव की सरगर्मी के बीच नेताओं के ऐसे बयान साफ संकेत दे रहे हैं कि पार्टियां अभी से आगे की बड़ी चुनावी लड़ाई के लिए जमीन तैयार करने में जुट गई हैं।





