Ice : कोरोना महामारी के बाद दुनिया वायरस से जुड़ी हर खबर को गंभीरता से देखती है। इसी बीच वैज्ञानिकों द्वारा 40 हजार साल पुराने जमे हुए सूक्ष्मजीवों को प्रयोगशाला में सक्रिय किए जाने की खबर ने लोगों की चिंता बढ़ा दी है। हालांकि वैज्ञानिकों का कहना है कि इस शोध का उद्देश्य किसी नए वायरस को फैलाना नहीं, बल्कि यह समझना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण पिघल रहे आर्कटिक क्षेत्रों से कौन-कौन से प्राचीन सूक्ष्मजीव दोबारा सक्रिय हो सकते हैं और उनका पर्यावरण पर क्या प्रभाव पड़ सकता है।
शोधकर्ताओं ने अलास्का के पर्माफ्रॉस्ट (स्थायी रूप से जमी मिट्टी, बर्फ और चट्टानों की परत) से नमूने एकत्र किए। इन नमूनों को नियंत्रित प्रयोगशाला परिस्थितियों में पिघलाकर उनका अध्ययन किया गया।
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जांच के दौरान पाया गया कि इनमें मौजूद कुछ प्राचीन सूक्ष्मजीव दोबारा सक्रिय होने लगे। शुरुआती चरण में कोई खास बदलाव नहीं दिखा, लेकिन कुछ महीनों बाद इन सूक्ष्मजीवों की गतिविधि बढ़ती नजर आई।
क्यों किया गया यह प्रयोग?
वैज्ञानिकों के अनुसार इस अध्ययन का मकसद यह समझना है कि यदि ग्लोबल वार्मिंग के कारण आर्कटिक क्षेत्र की बर्फ तेजी से पिघलती है, तो हजारों वर्षों से जमे सूक्ष्मजीव प्राकृतिक वातावरण में किस तरह व्यवहार करेंगे। इससे भविष्य में संभावित पर्यावरणीय और जैविक जोखिमों का बेहतर आकलन किया जा सकेगा। शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि अध्ययन में सक्रिय किए गए सूक्ष्मजीवों से फिलहाल इंसानों के संक्रमित होने का कोई प्रमाण नहीं मिला है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार ये सूक्ष्मजीव मानव स्वास्थ्य के लिए तत्काल खतरा नहीं माने जा रहे हैं। हालांकि वैज्ञानिकों का कहना है कि ऐसे प्राचीन सूक्ष्मजीवों का लगातार अध्ययन जरूरी है, क्योंकि भविष्य में इनके पर्यावरणीय प्रभावों को पूरी तरह समझना अभी बाकी है।
जलवायु परिवर्तन पर पड़ असर
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पर्माफ्रॉस्ट बड़े पैमाने पर पिघलता है और उसमें मौजूद सूक्ष्मजीव सक्रिय होते हैं, तो वे कार्बनिक पदार्थों को तोड़ने की प्रक्रिया तेज कर सकते हैं। इससे कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) और मीथेन (CH₄) जैसी ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन बढ़ सकता है। ये दोनों गैसें वैश्विक तापमान बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, जिससे जलवायु परिवर्तन की रफ्तार और तेज हो सकती है।
समझने की जरूरत
सोशल मीडिया पर इस तरह की खबरों को अक्सर “दुनिया खत्म करने वाला वायरस” या “नई महामारी” जैसे दावों के साथ पेश किया जाता है, लेकिन वर्तमान वैज्ञानिक जानकारी ऐसा नहीं कहती। यह शोध मुख्य रूप से जलवायु परिवर्तन और प्राचीन सूक्ष्मजीवों के व्यवहार को समझने के लिए किया गया है। फिलहाल ऐसा कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है कि यह 40 हजार साल पुराना सूक्ष्मजीव इंसानों में नई महामारी फैलाने वाला है। इसलिए अफवाहों पर भरोसा करने के बजाय वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर ही ऐसी खबरों को समझना जरूरी है।
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