GST Officer Disability Certificate Controversy : गर्मियों का मौसम आते ही बाजारों में आम की मिठास लोगों को अपनी ओर खींचने लगती है। दशहरी, लंगड़ा, चौसा और सफेदा जैसे आमों की खुशबू मंडियों से लेकर घरों तक पहुंच रही है। बच्चे हों या बुजुर्ग, हर कोई आम के स्वाद का इंतजार करता है। किसान भी पूरे साल मेहनत करने के बाद इस मौसम में बेहतर कमाई की उम्मीद रखते हैं। उत्तर प्रदेश समेत देश के कई हिस्सों में आम सिर्फ एक फल नहीं, बल्कि लोगों की भावनाओं और परंपराओं से जुड़ा हिस्सा माना जाता है। लेकिन इसी बीच प्रदेश में एक ऐसा मामला चर्चा में आ गया है, जिसने सरकारी व्यवस्थाओं और दिव्यांग प्रमाणपत्रों की पारदर्शिता को लेकर नई बहस छेड़ दी है। मामला अयोध्या में तैनात जीएसटी विभाग के एक अधिकारी से जुड़ा है, जिसकी सुनवाई अब हाईकोर्ट तक पहुंच चुकी है।
अयोध्या में तैनात जीएसटी विभाग के डिप्टी कमिश्नर प्रशांत सिंह एक बार फिर चर्चा में हैं। उनके दिव्यांगता प्रमाणपत्र की वैधता को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। आरोप है कि इसी प्रमाणपत्र के आधार पर उन्हें सरकारी सेवा में आरक्षण का लाभ मिला था। मामले को लेकर उनके बड़े भाई विश्वजीत सिंह लगातार जांच की मांग कर रहे हैं।
GST Officer Disability Certificate Controversy
स्वास्थ्य विभाग की ओर से गठित मेडिकल बोर्ड ने प्रशांत सिंह को पुनः परीक्षण के लिए बुलाया था, लेकिन वह निर्धारित तिथि पर उपस्थित नहीं हुए। उन्होंने लिखित रूप से कहा कि मामला न्यायालय में विचाराधीन है, इसलिए मेडिकल बोर्ड के समक्ष पेश होना उचित नहीं है। हालांकि शिकायतकर्ता पक्ष इस तर्क से सहमत नहीं है। इलाहाबाद हाईकोर्ट में दाखिल याचिका में न केवल प्रशांत सिंह बल्कि उनकी बहन जया सिंह के दिव्यांग प्रमाणपत्रों की भी जांच की मांग की गई है। याचिकाकर्ता ने राज्यभर में जारी संदिग्ध दिव्यांग प्रमाणपत्रों की व्यापक समीक्षा कराने की भी मांग उठाई है। कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए कई विभागों और अधिकारियों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
5 साल में कई बार बुलावा
मऊ के मुख्य चिकित्सा अधिकारी द्वारा शासन को भेजी गई रिपोर्ट के अनुसार, पिछले पांच वर्षों में प्रशांत सिंह को कई बार मेडिकल परीक्षण के लिए बुलाया गया, लेकिन वह किसी भी अवसर पर उपस्थित नहीं हुए। यही तथ्य अब जांच एजेंसियों और अदालत के सामने प्रमुख मुद्दा बन गया है। विश्वजीत सिंह का कहना है कि अगर प्रमाणपत्र सही है तो मेडिकल परीक्षण से बचने की जरूरत नहीं होनी चाहिए। उनका दावा है कि यह लड़ाई किसी व्यक्तिगत विवाद की नहीं, बल्कि व्यवस्था की पारदर्शिता और वास्तविक पात्र लोगों के अधिकारों की है। उन्होंने कहा कि यदि फर्जी प्रमाणपत्रों के जरिए नौकरियां हासिल की गई हैं, तो इसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
सरकारी विभागों से मांगा गया जवाब
हाईकोर्ट ने मुख्य सचिव, स्वास्थ्य विभाग, दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग, जीएसटी विभाग समेत कई सरकारी संस्थाओं से जवाब तलब किया है। अब सबकी नजर आगामी सुनवाई और जांच रिपोर्ट पर टिकी हुई है, जिससे यह तय होगा कि आरोपों में कितना दम है और आगे क्या कार्रवाई की जाएगी।
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