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Middle East War का असर दुनिया पर भारी, तेल-गैस संकट से घबराईं सरकारें; महंगाई काबू में रखने को उठाए जा रहे कदम

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Middle East War : पश्चिम एशिया में जारी युद्ध अब सिर्फ सैन्य टकराव तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि इसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी साफ दिखाई देने लगा है। लंबे समय तक संघर्ष चलने की आशंका ने दुनिया की कई सरकारों को चिंता में डाल दिया है। खासकर ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता बढ़ने से देशों को ईंधन की आपूर्ति और कीमतों दोनों को लेकर मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है।

यूरोप और एशिया के कई देश पहले ही महंगाई के दबाव से जूझ रहे थे। ऐसे में युद्ध के कारण तेल और गैस की सप्लाई प्रभावित होने का खतरा उनकी आर्थिक योजनाओं को और मुश्किल बना रहा है। सरकारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे आम लोगों को राहत दें और साथ ही अर्थव्यवस्था को भी संतुलित रखें।

Middle East War का असर

ऊर्जा संकट का सबसे ज्यादा असर उन देशों पर पड़ रहा है जो अपनी जरूरत का अधिकांश तेल और गैस आयात करते हैं। यूरोप और एशिया के कई देशों की अर्थव्यवस्था विदेशी ऊर्जा स्रोतों पर काफी हद तक निर्भर है। जैसे-जैसे युद्ध का दायरा बढ़ रहा है, ऊर्जा बाजार में अस्थिरता भी बढ़ती जा रही है। इससे तेल और गैस की कीमतों में तेज उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है, तो कई देशों के बजट और आर्थिक योजनाओं पर गंभीर असर पड़ सकता है।

उठाए जा रहे कदम

ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर आम लोगों की जेब पर पड़ता है। यही कारण है कि कई सरकारें नागरिकों को राहत देने के लिए अलग-अलग कदम उठा रही हैं।
पुर्तगाल ने डीजल पर लगाए जाने वाले टैक्स में कटौती करने का फैसला किया है, ताकि ईंधन की कीमतों को नियंत्रित किया जा सके। वहीं ग्रीस सरकार ने पेट्रोल और कुछ जरूरी किराना सामान की बिक्री पर मुनाफे की सीमा तय कर दी है। दूसरी ओर दक्षिण कोरिया घरेलू उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए ऊर्जा वाउचर योजना शुरू करने पर विचार कर रहा है। इन कदमों का मकसद महंगाई के दबाव को कुछ हद तक कम करना है।

राजनीतिक दबाव भी बन रहा बड़ा मुद्दा

आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि ऊर्जा संकट सिर्फ आर्थिक समस्या नहीं है, बल्कि यह राजनीतिक चुनौती भी बन सकता है। रिसर्च ग्रुप ऑक्सफोर्ड इकोनॉमिक्स के मुख्य यूरोपीय अर्थशास्त्री एंजेल तलवेरा के अनुसार, सरकारों के लिए वित्तीय स्थिति जितनी महत्वपूर्ण है, उतना ही बड़ा कारक राजनीतिक दबाव भी है। ऊर्जा की बढ़ती कीमतें सीधे मतदाताओं को प्रभावित करती हैं। ऐसे में सरकारों पर महंगाई नियंत्रित करने और राहत देने का दबाव तेजी से बढ़ रहा है। यही वजह है कि कई देशों में ऊर्जा नीति को लेकर लगातार चर्चा और नए फैसले लिए जा रहे हैं।

ऊर्जा सप्लाई पर बना खतरा

इस बीच युद्ध के मोर्चे से भी चिंताजनक खबरें आ रही हैं। ईरान की ओर से कतर और सऊदी अरब के प्रमुख ऊर्जा केंद्रों को निशाना बनाए जाने की घटनाओं ने वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता और बढ़ा दी है। होर्मुज जलडमरूमध्य का बंद होना भी अंतरराष्ट्रीय बाजार के लिए बड़ी चिंता का कारण बना हुआ है। दुनिया की कुल तेल खपत का करीब 20 प्रतिशत हिस्सा इसी समुद्री मार्ग से गुजरता है। ऐसे में अगर यह रास्ता लंबे समय तक बंद रहता है, तो वैश्विक ऊर्जा बाजार पर इसका गहरा असर पड़ सकता है।

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Will the middle class get relief from the first general budget of Modi 3.0?