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Khamenei के खात्मे के बाद भी ट्रंप के लिए ईरान की राह आसान नहीं, रणनीति पर उठे सवाल

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Khamenei : अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान के खिलाफ शुरू किए गए सैन्य अभियान ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ को एक सप्ताह से ज्यादा समय हो चुका है। शुरुआती दिनों में दोनों देशों को कुछ सामरिक सफलताएं जरूर मिलीं, लेकिन अब हालात पहले से कहीं ज्यादा उलझते नजर आ रहे हैं। क्षेत्र में बढ़ते तनाव ने यह संकेत दे दिया है कि यह टकराव जल्दी खत्म होने वाला नहीं है। कई अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का मानना है कि इस अभियान ने मिडिल ईस्ट को एक बड़े और लंबे संघर्ष की ओर धकेल दिया है, जिसका असर वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है।

हालिया घटनाक्रम में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत और ईरानी सैन्य ठिकानों पर हुए बड़े हमलों ने हालात को और ज्यादा संवेदनशील बना दिया है। अमेरिका और इजरायल ने कई महत्वपूर्ण सैन्य और रणनीतिक ठिकानों को निशाना बनाकर ईरान की सैन्य क्षमता को कमजोर करने की कोशिश की।

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हालांकि, इन हमलों के बावजूद ईरान की प्रतिक्रिया ने यह दिखा दिया है कि वह इस संघर्ष में पीछे हटने के मूड में नहीं है। क्षेत्र में लगातार बढ़ती सैन्य गतिविधियां यह संकेत दे रही हैं कि हालात तेजी से नियंत्रण से बाहर जा सकते हैं। अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का मानना है कि ईरान के साथ टकराव किसी छोटे अभियान की तरह नहीं है। वाशिंगटन स्थित जॉन्स हॉपकिन्स स्कूल फॉर एडवांस्ड इंटरनेशनल स्टडीज की विशेषज्ञ लौरा ब्लुमेनफेल्ड के मुताबिक, ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई बेहद जटिल और लंबी हो सकती है। उनका कहना है कि इस स्थिति से न केवल मिडिल ईस्ट की स्थिरता प्रभावित होगी बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था और अमेरिकी घरेलू राजनीति पर भी असर पड़ सकता है। खासकर अमेरिका में होने वाले आगामी मध्यावधि चुनावों के लिहाज से यह मामला राजनीतिक रूप से संवेदनशील बनता जा रहा है।

अब भी साफ नहीं

रिपोर्टों के अनुसार अमेरिका की रणनीति का मुख्य उद्देश्य ईरान की बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता को खत्म करना, उसकी नौसैनिक ताकत को कमजोर करना और उसके सहयोगी समूहों को मिलने वाली सैन्य मदद को रोकना है। साथ ही वॉशिंगटन यह भी चाहता है कि ईरान भविष्य में परमाणु हथियार विकसित न कर सके। हालांकि इन उद्देश्यों के बावजूद अब तक अमेरिकी प्रशासन ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि इस अभियान की अंतिम सीमा क्या होगी या जीत को किस रूप में देखा जाएगा।

MAGA समर्थकों में भी मतभेद

अमेरिका के भीतर भी इस सैन्य अभियान को लेकर अलग-अलग राय सामने आ रही हैं। डोनाल्ड ट्रंप के समर्थकों के बीच भी इस मुद्दे पर मतभेद दिखाई दे रहे हैं। एक वर्ग ऐसा है जो ट्रंप के ‘नए युद्ध न छेड़ने’ के वादे को याद दिला रहा है, जबकि दूसरा वर्ग राष्ट्रपति के फैसलों के साथ खड़ा है। हालांकि विश्लेषकों का मानना है कि अगर यह संघर्ष लंबा चलता है या अमेरिकी सैनिकों की मौतें बढ़ती हैं, तो ट्रंप के लिए घरेलू समर्थन बनाए रखना मुश्किल हो सकता है।

मिडिल ईस्ट में खुल रहे नए मोर्चे

ईरान और इजरायल के बीच शुरू हुआ यह संघर्ष अब पूरे क्षेत्र में फैलता नजर आ रहा है। ईरान ने अमेरिकी और इजरायली ठिकानों पर जवाबी कार्रवाई के साथ खाड़ी क्षेत्र के कई इलाकों में हमले तेज कर दिए हैं। वहीं लेबनान के हिजबुल्लाह संगठन ने भी इजरायल के खिलाफ फिर से मोर्चा खोल दिया है। इससे साफ हो गया है कि तेहरान अपने सहयोगी संगठनों को सक्रिय करने की क्षमता अब भी रखता है, जिससे युद्ध का दायरा और बढ़ सकता है।

अर्थव्यवस्था पर भी मंडराने लगा खतरा

मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव का असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है। हाल ही में ईरान ने कुछ जहाजों की आवाजाही रोक दी थी, जिससे अंतरराष्ट्रीय तेल आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ गई। हालांकि बाद में ईरान ने कहा कि महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग केवल अमेरिकी, इजरायली और यूरोपीय जहाजों के लिए बंद रहेंगे। अटलांटिक काउंसिल के विशेषज्ञ जोश लिपस्की के अनुसार, अगर यह स्थिति लंबी चली तो इसका असर सीधे अमेरिकी और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।

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