Israel : मध्य-पूर्व एक बार फिर बड़े सैन्य तनाव के दौर से गुजर रहा है। अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच जारी खींचतान अब खुली सैन्य कार्रवाई में बदलती दिख रही है। पिछले कुछ दिनों से लगातार हमले और जवाबी हमले हो रहे हैं, जिससे पूरे क्षेत्र में अस्थिरता का माहौल बन गया है। हालात ऐसे हैं कि फिलहाल इस संघर्ष के थमने के कोई साफ संकेत नजर नहीं आ रहे। अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ भी मान रहे हैं कि अगर यही स्थिति बनी रही तो इसका असर वैश्विक राजनीति और तेल बाजार दोनों पर पड़ सकता है।
ताजा घटनाक्रम में इजरायल ने ईरान के ऊर्जा ढांचे पर बड़ा हमला किया है। रिपोर्टों के मुताबिक तेहरान और उसके आसपास के इलाकों में स्थित कई तेल भंडारण स्थलों पर बमबारी की गई।
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शनिवार को तेहरान और पड़ोसी शहर करज में तेज धमाकों की आवाजें सुनी गईं। हमले के बाद कई फ्यूल स्टोरेज कॉम्प्लेक्स में आग लग गई और आसमान में धुएं का घना गुबार उठता देखा गया। सोशल मीडिया पर सामने आए वीडियो में आग की ऊंची लपटें और जलते हुए तेल डिपो दिखाई दे रहे हैं। माना जा रहा है कि इन हमलों से ईरान के ऊर्जा नेटवर्क को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की गई है।
अमेरिका और इजरायल की संयुक्त रणनीति
सूत्रों के अनुसार, हाल के दिनों में अमेरिका और इजरायल ने मिलकर ईरान के ऊर्जा इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाने की रणनीति अपनाई है। तेहरान के साथ-साथ अल्बोर्ज प्रांत में भी कई तेल भंडारण डिपो पर हमले किए गए। विश्लेषकों का मानना है कि इन हमलों का उद्देश्य ईरान की आर्थिक और सैन्य क्षमता को कमजोर करना है। इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने भी संकेत दिए हैं कि आगे और कार्रवाई हो सकती है। उनका कहना है कि ईरान को आने वाले समय में कई “अप्रत्याशित झटके” मिल सकते हैं।
ईरान का दावा
उधर ईरान ने भी साफ कर दिया है कि वह इस टकराव से पीछे हटने वाला नहीं है। इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के प्रवक्ता अली मोहम्मद नैनी ने कहा है कि ईरानी सेना मौजूदा गति से कम से कम छह महीने तक संघर्ष जारी रखने की क्षमता रखती है। फार्स न्यूज एजेंसी को दिए बयान में उन्होंने दावा किया कि ईरान ने अब तक पूरे क्षेत्र में अमेरिका और इजरायल से जुड़े 200 से अधिक ठिकानों को निशाना बनाया है। उनका कहना है कि अगर हमले जारी रहे तो ईरान भी उसी तीव्रता से जवाब देता रहेगा।
पूरे क्षेत्र पर पड़ सकता है असर
लगातार हो रही सैन्य कार्रवाई से मिडिल ईस्ट के हालात और ज्यादा संवेदनशील हो गए हैं। तेल उत्पादन और आपूर्ति पर असर पड़ने की आशंका से वैश्विक बाजार भी चिंतित हैं। वहीं क्षेत्रीय देशों में भी सुरक्षा को लेकर सतर्कता बढ़ा दी गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जल्द कूटनीतिक पहल नहीं हुई तो यह संघर्ष लंबे समय तक चल सकता है और इसके परिणाम दूरगामी हो सकते हैं।
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