Rahul Gandhi : पूर्व सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की एक अप्रकाशित किताब इन दिनों राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गई है। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने इस किताब को लेकर ऐसा दावा किया, जिसने सरकार से लेकर प्रकाशन जगत तक हलचल मचा दी। राहुल गांधी का कहना है कि जिस किताब को आधिकारिक तौर पर अभी प्रकाशित नहीं बताया जा रहा, वह ऑनलाइन प्लेटफॉर्म अमेजन पर उपलब्ध है। इस दावे के बाद मामला सिर्फ एक किताब तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सच्चाई और भरोसे की जंग में बदल गया।
इस पूरे विवाद से पहले दिल्ली पुलिस ने जनरल नरवणे की कथित किताब के सर्कुलेशन को लेकर एफआईआर दर्ज की है। जांच इस बात की हो रही है कि अगर किताब अभी प्रकाशित नहीं हुई है, तो उसकी प्रतियां या लिंक सार्वजनिक रूप से कैसे सामने आए।
Rahul Gandhi का दावा
इसी बीच प्रकाशन संस्था पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया ने साफ कहा है कि किताब फिलहाल प्रकाशित नहीं की गई है और किसी भी आधिकारिक बिक्री की अनुमति नहीं दी गई है। लोकसभा में बोलते हुए राहुल गांधी ने इस पूरे मामले को सीधे-सीधे सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया। उन्होंने जनरल नरवणे के एक कथित ट्वीट का जिक्र किया, जिसमें किताब का लिंक फॉलो करने की बात कही गई थी। राहुल गांधी ने कहा कि अगर किताब के लिंक की बात खुद लेखक कर रहे हैं, तो फिर यह मानना मुश्किल है कि किताब उपलब्ध नहीं है। उनके मुताबिक, या तो लेखक गलत हैं या फिर प्रकाशक।
बढ़ा विवाद
राहुल गांधी ने दावा किया कि यह किताब अमेजन पर उपलब्ध है और 2023 में इसे खरीदने की अपील भी की गई थी। उन्होंने यह भी कहा कि अगर किताब ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर दिख रही है, तो फिर यह कैसे कहा जा सकता है कि वह प्रकाशित नहीं हुई। इस बयान के बाद सदन में हलचल तेज हो गई और मामला राजनीतिक रंग लेने लगा। कांग्रेस सांसद ने साफ शब्दों में कहा कि उन्हें प्रकाशन संस्था से ज्यादा भरोसा जनरल नरवणे पर है। उन्होंने यह भी इशारा किया कि संभव है किताब में ऐसी बातें लिखी गई हों, जो मौजूदा सरकार और प्रधानमंत्री के लिए असहज हों। इसी कारण किताब को लेकर भ्रम और विवाद पैदा हुआ हो। राहुल गांधी ने इसे सिर्फ किताब का मामला नहीं, बल्कि सच सामने आने का सवाल बताया।
मोदी जी किससे भाग रहे हैं?
– किताबों से
– बहस से
– सच से pic.twitter.com/PFaMyEVPGa— Rahul Gandhi (@RahulGandhi) February 9, 2026
फिलहाल, यह स्पष्ट नहीं है कि किताब वास्तव में कहां तक पहुंच चुकी है और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर दिख रही जानकारी कितनी आधिकारिक है। जांच एजेंसियां अपने स्तर पर पड़ताल कर रही हैं। इतना तय है कि जनरल नरवणे की किताब अब सिर्फ साहित्यिक चर्चा का विषय नहीं रही, बल्कि राजनीतिक टकराव का नया मोर्चा बन चुकी है।
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