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आज से हुई फाल्गुन माह की शुरुआत, जाने कैसे प्रसन्न होंगे महादेव और भगवान श्री कृष्ण

Phalgun Month:- फाल्गुन माह आज से शुरू हो चुका है। हिंदू पंचांग का यह आखिरी महीना माना जाता है। इस फाल्गुन महीने को वसंत ऋतु और भक्ति के साथ उल्लाह का प्रतीक कहा गया है। फाल्गुन के इस महीने का बहुत ही खास महत्व होता है। इसका आध्यात्मिक महत्व इसलिए ज्यादा है क्योंकि इस महीने में भगवान शिव और श्री कृष्ण की पूजा आराधना करने के लिए बहुत ही पावन और शुभ माना जाता है।

इस पावन महीने में भगवान शिव और श्री कृष्ण की पूजा आराधना करने का विधान होता है। घर में अगर आप सुख-शांति और समृद्धि चाहते है तो आपको इस महीने में पूजा पाठ जरूर करना चाहिए। आइए इसके बारे में विस्तार से जानते है।

फाल्गुन महीने के खास नियम और सावधानियां

फाल्गुन महीने में सुबह के समय जल्दी उठ कर नहा ले। इस बात का खास ध्यान रखे की इस महीने में अनाज का कम और फलों का ज्यादा से ज्यादा सेवन करें। यह महीना बहुत ही पावन और आनंद का माना जाता है। इसलिए इस दिन वाणी में मिठास रखें और किसी भी तरह का किसी से विवाद ना करें। इस महीने में भगवान विष्णु और श्री कृष्णा की पूजा आराधना करें। इस महीने में गलती से भी तामसिक भोजन ना खाएं। इस फाल्गुन महीने में किसी के भी बारे में बुरा बोलने या सोचने से बचें। इस पावन महीने में दान-पुण्य ओर पूजा-पाठ जरूर करें। फाल्गुन महीने में पूजा-पाठ जरूर करना चाहिए।

॥श्रीकृष्ण जी की आरती॥

आरती कुंजबिहारी की,

श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥

आरती कुंजबिहारी की,

श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥

गले में बैजंती माला,

बजावै मुरली मधुर बाला ।

श्रवण में कुण्डल झलकाला,

नंद के आनंद नंदलाला ।

गगन सम अंग कांति काली,

राधिका चमक रही आली ।

लतन में ठाढ़े बनमाली

भ्रमर सी अलक,

कस्तूरी तिलक,

चंद्र सी झलक,

ललित छवि श्यामा प्यारी की,

श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥

आरती कुंजबिहारी की,

श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥

कनकमय मोर मुकुट बिलसै,

देवता दरसन को तरसैं ।

गगन सों सुमन रासि बरसै ।

बजे मुरचंग,

मधुर मिरदंग,

ग्वालिन संग,

अतुल रति गोप कुमारी की,

श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की ॥

आरती कुंजबिहारी की,

श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥

जहां ते प्रकट भई गंगा,

सकल मन हारिणि श्री गंगा ।

स्मरन ते होत मोह भंगा

बसी शिव सीस,

जटा के बीच,

हरै अघ कीच,

चरन छवि श्री बनवारी की,

श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥

आरती कुंजबिहारी की,

श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥

चमकती उज्ज्वल तट रेनू,

बज रही वृंदावन बेनू ।

चहुं दिसि गोपि ग्वाल धेनू

हंसत मृदु मंद,

चांदनी चंद,

कटत भव फंद,

टेर सुन दीन दुखारी की,

श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥

आरती कुंजबिहारी की,

श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥

आरती कुंजबिहारी की,

श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥

आरती कुंजबिहारी की,

श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥

॥शिवजी की आरती॥

ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।

ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, अर्द्धांगी धारा ॥

ॐ जय शिव ओंकारा…

एकानन चतुरानन पंचानन राजे।

हंसासन गरूड़ासन, वृषवाहन साजे ॥

ॐ जय शिव ओंकारा…

दो भुज चार चतुर्भुज, दसभुज अति सोहे ।

त्रिगुण रूप निरखते, त्रिभुवन जन मोहे ॥

ॐ जय शिव ओंकारा…

अक्षमाला वनमाला, मुण्डमाला धारी ।

चंदन मृगमद सोहै, भाले शशिधारी ॥

ॐ जय शिव ओंकारा…

श्वेताम्बर पीताम्बर, बाघम्बर अंगे।

सनकादिक गरुणादिक, भूतादिक संगे ॥

ॐ जय शिव ओंकारा…

कर के मध्य कमंडल, चक्र त्रिशूलधारी।

सुखकारी दुखहारी, जगपालन कारी॥

ॐ जय शिव ओंकारा…

ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, जानत अविवेका।

प्रणवाक्षर में शोभित, ये तीनों एका ॥

ॐ जय शिव ओंकारा…

त्रिगुणस्वामी जी की आरति, जो कोइ नर गावे।

कहत शिवानंद स्वाम, सुख संपति पावे ॥

ॐ जय शिव ओंकारा…।।

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