Naveen Jindal : आज ‘हर घर तिरंगा’ अभियान देशभर में गर्व, देशभक्ति और राष्ट्रीय एकता का प्रतीक बन चुका है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा शुरू की गई इस पहल का उद्देश्य लोगों को तिरंगे से भावनात्मक रूप से जोड़ना है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि आज जो अधिकार हमें सहज रूप से मिला हुआ लगता है, वह कभी आम नागरिकों के लिए प्रतिबंधित था। आज़ादी के बाद कई दशकों तक तिरंगा फहराना केवल सरकारी संस्थानों और कुछ खास मौकों तक सीमित था।
आज यह कल्पना करना भी मुश्किल लगता है कि एक समय ऐसा भी था जब आम भारतीय अपने घर, दफ्तर या निजी परिसर में तिरंगा नहीं फहरा सकते थे। उस दौर में राष्ट्रीय ध्वज के इस्तेमाल को लेकर कड़े नियम थे।
Naveen Jindal ने तिरंगे के लिए लड़ी थी कानूनी लड़ाई
तिरंगा केवल सरकारी भवनों, आधिकारिक समारोहों और उच्च पदस्थ अधिकारियों के वाहनों तक ही सीमित था। आम जनता के लिए यह अधिकार नहीं बल्कि एक प्रतिबंध जैसा था। इस ऐतिहासिक बदलाव की शुरुआत हुई एक उद्योगपति की जिद और देशभक्ति से। यह नाम नवीन जिंदल है, जो कि जिंदल स्टील एंड पावर के चेयरमैन और एक बड़े कारोबारी। 1993 में जब वे अपने औद्योगिक परिसर में तिरंगा फहराना चाहते थे, तो अधिकारियों ने उन्हें रोक दिया। यहीं से उन्हें यह अहसास हुआ कि देश के नागरिकों को अपने ही राष्ट्रीय ध्वज के उपयोग से वंचित रखा गया है।
कानूनी लड़ाई की शुरुआत
नवीन जिंदल ने इस प्रतिबंध को केवल नियम नहीं, बल्कि नागरिक अधिकारों का उल्लंघन माना। उन्होंने 1995 में दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर की और ध्वज संहिता में बदलाव की मांग की। उनका तर्क था कि तिरंगा फहराना किसी सरकारी संस्था का विशेषाधिकार नहीं, बल्कि हर भारतीय का मौलिक अधिकार होना चाहिए। यह मामला धीरे-धीरे एक राष्ट्रीय बहस में बदल गया।
सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला
लगभग एक दशक तक चली कानूनी प्रक्रिया के बाद, 23 जनवरी 2004 को सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि तिरंगा फहराना हर भारतीय नागरिक का अधिकार है, बशर्ते वह राष्ट्रीय ध्वज की गरिमा और नियमों का सम्मान करे। इस फैसले के साथ ही आम लोगों के लिए पूरे वर्ष तिरंगा फहराने का रास्ता खुल गया।
आज का भारत
आज जब देशभर में घरों, स्कूलों, दफ्तरों और सड़कों पर तिरंगा लहराता है, तो उसके पीछे एक कानूनी संघर्ष और नागरिक अधिकार की कहानी छिपी है। ‘हर घर तिरंगा’ अभियान केवल एक सरकारी पहल नहीं, बल्कि उस ऐतिहासिक लड़ाई का विस्तार है, जिसने हर भारतीय को अपने राष्ट्रीय ध्वज के साथ गर्व से खड़े होने का अधिकार दिया।
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