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Jyotish News: क्यों 108 पर आकर ठहर जाती है माला? आस्था, आकाश और विज्ञान से जुड़ा गहरा रहस्य

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Jyotish News : हिंदू परंपरा में पूजा-पाठ केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि एक गहरी साधना मानी जाती है। जब भी मंत्र जाप की बात आती है, माला अपने आप में एक जरूरी साधन बन जाती है। खास बात यह है कि इस माला में मोतियों की संख्या हमेशा 108 ही होती है। यह कोई संयोग नहीं, बल्कि सदियों पुरानी परंपरा और गणना का परिणाम है, जिसे ऋषियों ने गहन अध्ययन के बाद अपनाया। भारतीय ज्योतिष में आकाश को नक्षत्रों और राशियों के माध्यम से समझा गया है।

कुल 27 नक्षत्र माने गए हैं और हर नक्षत्र के चार चरण होते हैं। इन दोनों को जोड़ने पर जो संख्या निकलती है, वह 108 है। माला का हर मनका इन्हीं चरणों का प्रतीक माना जाता है, यानी जाप करते समय साधक पूरे ब्रह्मांड से जुड़ने का भाव करता है।

Jyotish News: क्यों 108 पर आकर ठहर जाती है माला?

ज्योतिष शास्त्र में 12 राशियां और 9 ग्रह माने जाते हैं। इन दोनों का गुणनफल भी 108 ही आता है। इसका अर्थ यह माना गया कि यह संख्या मानव जीवन, ग्रहों की चाल और प्रकृति के संतुलन को दर्शाती है। मंत्र जाप के दौरान 108 बार उच्चारण करने से व्यक्ति खुद को इस संतुलन के साथ जोड़ता है। प्राचीन भारत के विद्वानों को खगोल विज्ञान की असाधारण समझ थी। आधुनिक गणनाएं भी इस बात की पुष्टि करती हैं कि पृथ्वी से सूर्य की औसत दूरी, सूर्य के व्यास से लगभग 108 गुना है। यही अनुपात पृथ्वी और चंद्रमा के बीच भी देखने को मिलता है। इस खगोलीय समानता ने 108 को एक विशेष और पूर्ण संख्या का दर्जा दिया।

शरीर, श्वास और साधना का विज्ञान

अध्यात्म और आयुर्वेद के अनुसार, एक स्वस्थ इंसान दिन में करीब 21,600 बार सांस लेता है। शास्त्रों में यह माना गया कि जीवन की आधी ऊर्जा ईश्वर-स्मरण में लगनी चाहिए। यानी 10,800 श्वास। साधारण जीवन में इतना लंबा ध्यान संभव न होने के कारण इसी संख्या को संक्षिप्त कर 108 बनाया गया, ताकि कम समय में भी साधना का प्रभाव मिले। 108 के तीन अंक अपने आप में अर्थपूर्ण हैं। पहला अंक ‘1’ एकता और परम सत्य का संकेत देता है। ‘0’ शून्यता, पूर्णता और अहंकार के त्याग का प्रतीक है। वहीं ‘8’ को अनंत का चिन्ह माना जाता है, जो यह बताता है कि साधना की यात्रा कभी समाप्त नहीं होती।

आस्था और विज्ञान का संगम

माला के 108 मनके यह दिखाते हैं कि भारतीय परंपरा में आस्था और तर्क एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। जहां एक ओर इसमें भक्ति और श्रद्धा है। वहीं, दूसरी ओर खगोल, गणित और मानव शरीर का संतुलन भी शामिल है। हजारों साल बाद भी 108 की महत्ता कम नहीं हुई है। मंदिरों से लेकर योग और ध्यान केंद्रों तक, यही संख्या साधना का आधार बनी हुई है। यह सिर्फ एक गिनती नहीं, बल्कि जीवन, ब्रह्मांड और चेतना को जोड़ने वाली कड़ी मानी जाती है।

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