Home » धर्म » Somnath Temple भारत का पहला ज्योतिर्लिंग, महमूद गजनवी के आक्रमण के 1000 साल पूरे

Somnath Temple भारत का पहला ज्योतिर्लिंग, महमूद गजनवी के आक्रमण के 1000 साल पूरे

Somnath Temple
Somnath Temple

Somnath Temple : गुजरात के प्रभास पाटन में स्थित सोमनाथ मंदिर केवल एक तीर्थ नहीं, बल्कि भारतीय चेतना की जीवंत पहचान है। द्वादश ज्योतिर्लिंगों में प्रथम स्थान पाने वाला यह मंदिर सदियों से विश्वास, तप और परंपरा का केंद्र रहा है। वर्ष 2026 सोमनाथ के इतिहास में खास महत्व रखता है, क्योंकि इस साल मंदिर पर हुए पहले आक्रमण को एक हजार वर्ष पूरे हो रहे हैं। अरब सागर के तट पर स्थित सोमनाथ प्राचीन भारत की आध्यात्मिक ही नहीं, बल्कि आर्थिक और समुद्री समृद्धि का भी प्रतीक रहा है। दूर-दूर से आने वाले व्यापारी, साधु और यात्री इस क्षेत्र की संपन्नता और मंदिर की भव्यता के साक्षी रहे हैं।

बता दें कि धार्मिक मान्यताओं में सोमनाथ के दर्शन को मोक्षदायी बताया गया है, यही कारण है कि इसकी महिमा युगों-युगों तक बनी रही। जनवरी 1026 में महमूद गजनवी के आक्रमण ने पूरे भारतीय उपमहाद्वीप को झकझोर दिया।

Somnath Temple: इतिहास का सबसे कड़ा अध्याय

दरअसल, यह हमला लूट के साथ-साथ सांस्कृतिक और धार्मिक प्रतीक को तोड़ने का प्रयास था। मंदिर को भारी क्षति पहुंची और नगरवासियों को अमानवीय पीड़ा झेलनी पड़ी। सोमनाथ का इतिहास केवल टूटने का नहीं, बल्कि हर बार फिर खड़े होने का रहा है। मध्यकाल में कई बार हमले हुए, लेकिन हर पीढ़ी ने मंदिर को दोबारा संवारने का संकल्प लिया। यह पुनर्निर्माण पत्थरों, आत्मबल और सांस्कृतिक चेतना का पुनर्जन्म था। इसी क्रम में महारानी अहिल्याबाई होलकर जैसे व्यक्तित्वों ने सोमनाथ को फिर से पूजा योग्य बनाया।

राष्ट्रीय चेतना की आवाज बना सोमनाथ

उन्नीसवीं सदी के अंत में स्वामी विवेकानंद जब सोमनाथ पहुंचे, तो उन्होंने इसे भारत के इतिहास की खुली किताब बताया। उनके अनुसार, ऐसे स्थल किसी भी पाठ्यपुस्तक से बेहतर ढंग से राष्ट्र की आत्मा को समझाते हैं। सोमनाथ धीरे-धीरे धार्मिक स्थल से आगे बढ़कर राष्ट्रीय स्वाभिमान का प्रतीक बन गया। 1947 के बाद सोमनाथ के पुनर्निर्माण का संकल्प स्वतंत्र भारत की पहली बड़ी सांस्कृतिक घोषणाओं में शामिल था। सरदार वल्लभभाई पटेल ने मंदिर की जर्जर स्थिति देखकर इसके पुनर्निर्माण का फैसला लिया। 11 मई 1951 को डॉ. राजेंद्र प्रसाद की उपस्थिति में नया सोमनाथ मंदिर राष्ट्र को समर्पित किया गया। यह निर्णय उस दौर में साहस और सांस्कृतिक आत्मविश्वास का प्रतीक बना।

केएम मुंशी की अहम भूमिका

इस पूरे आंदोलन में केएम मुंशी की भूमिका अहम रही। उन्होंने न केवल पुनर्निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया, बल्कि सोमनाथ पर आधारित अपनी पुस्तक के जरिए इसे वैचारिक आधार भी दिया। उनका मानना था कि जो शाश्वत है, वह नष्ट नहीं हो सकता। यही विचार सोमनाथ की आत्मा में बसता है। एक हजार साल बाद भी सोमनाथ उसी दृढ़ता के साथ समुद्र के किनारे खड़ा है।

Read More : Magh Purnima 2026: इस दिन मनाई जाएगी माघ पूर्णिमा, जानें महत्व व मुहूर्त

0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest
0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments
Will the middle class get relief from the first general budget of Modi 3.0?