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Cotton City of India, इतिहास में दर्ज है आज भी नाम; बना सबसे बड़ा टेक्सटाइल हब

Cotton City of India
Cotton City of India

Cotton City of India : मुंबई का नाम आते ही ऊंची इमारतें, लोकल ट्रेन और शेयर बाजार की हलचल आंखों के सामने आ जाती है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इस महानगर की असली पहचान कभी ‘कपास’ से जुड़ी थी। आज से करीब डेढ़-दो सौ साल पहले, मुंबई भारत के औद्योगिक मानचित्र पर एक ऐसे शहर के रूप में उभरा, जिसने सूती कपड़े के दम पर देश की आर्थिक दिशा बदल दी। औपनिवेशिक दौर में मुंबई तेजी से सूती वस्त्र उद्योग का केंद्र बना। यहां कपास से धागा और धागे से कपड़ा बनने लगा। देखते ही देखते शहर में कपड़ा मिलों की कतार लग गई। इन मिलों ने न सिर्फ व्यापार को रफ्तार दी, बल्कि मुंबई को देश के सबसे व्यस्त औद्योगिक शहरों में शामिल कर दिया।

मुंबई की सबसे बड़ी ताकत उसका प्राकृतिक बंदरगाह रहा। समुद्र के रास्ते कपास का आयात-निर्यात आसान हुआ। इंग्लैंड और दूसरे यूरोपीय देशों तक यहां बना कपड़ा भेजा जाने लगा।

Cotton City of India मुंबई

तैयार माल सीधे जहाजों से विदेश पहुंचता था, जिससे मुंबई वैश्विक व्यापार का अहम पड़ाव बन गई। कपास उगाने वाले इलाकों को मुंबई से जोड़ने में रेलवे ने बड़ी भूमिका निभाई। विदर्भ, खानदेश और मध्य भारत से कच्चा कपास रेल के जरिए शहर पहुंचता था। वहीं, तैयार कपड़ा फिर रेल और समुद्री मार्ग से देश-दुनिया में भेजा जाता। इस नेटवर्क ने व्यापार को स्थायित्व दिया।

रोजगार से बदली लाखों जिंदगियां

कपड़ा मिलों ने मुंबई में रोजगार का सैलाब ला दिया। गांवों से लोग काम की तलाश में शहर पहुंचे। मजदूर बस्तियां बसीं, नई कॉलोनियां बनीं और शहर का आकार फैलता गया। सूती उद्योग ने मिल मजदूरों के साथ-साथ रंगाई, बुनाई, सिलाई और परिवहन से जुड़े हजारों लोगों को रोजी दी। आज मुंबई को देश की वित्तीय राजधानी कहा जाता है, लेकिन इसकी नींव कपड़ा उद्योग ने ही रखी। मिल मालिकों, व्यापारियों और निर्यातकों के कारण बैंकों, बीमा कंपनियों और वित्तीय संस्थानों का विकास हुआ। यही आर्थिक गतिविधियां आगे चलकर शेयर बाजार और बड़े कॉर्पोरेट ढांचे की वजह बनीं।

खेतों में उगता ‘सफेद सोना’

मुंबई की मिलों तक पहुंचने वाली कपास का बड़ा हिस्सा महाराष्ट्र के यवतमाल जैसे इलाकों से आता था। काली मिट्टी और अनुकूल मौसम ने इस क्षेत्र को कपास उत्पादन का गढ़ बना दिया। यहां की मंडियों से कपास की गांठें देश भर की मिलों में भेजी जाती थीं। यवतमाल और आसपास के क्षेत्रों में खेती, मजदूरी, परिवहन और जिनिंग-प्रेसिंग यूनिट्स सब कुछ कपास पर निर्भर रहा। किसान से लेकर व्यापारी तक, हर किसी की आजीविका इसी ‘सफेद सोने’ से जुड़ी थी। यह ग्रामीण और शहरी अर्थव्यवस्था का मजबूत सेतु बना।

समय के साथ कपड़ा मिलों का दौर ढल गया, लेकिन इतिहास में मुंबई की पहचान ‘कॉटन सिटी’ के रूप में दर्ज है। जिन खेतों में कपास उगा और जिन मिलों में कपड़ा बना, उन्होंने मिलकर एक ऐसे शहर को गढ़ा, जो आज भी देश की अर्थव्यवस्था की धड़कन बना हुआ है।

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