Shani Dev : हिंदू मान्यताओं में शनि देव को कर्मों का लेखा-जोखा रखने वाला देवता माना गया है। सूर्य देव के पुत्र शनि को न्यायप्रिय कहा जाता है, लेकिन उनकी दृष्टि से लोग भयभीत भी रहते हैं। ऐसी मान्यता है कि जब शनि की दृष्टि किसी व्यक्ति पर पड़ती है, तो उसके जीवन में संघर्ष, बाधाएं और कष्ट बढ़ जाते हैं। इसी कारण शनि दोष से मुक्ति के उपाय सदियों से खोजे जाते रहे हैं। शनि दोष से राहत पाने के उपायों में पीपल के वृक्ष की पूजा को विशेष महत्व दिया गया है।
सूर्योदय से पहले पीपल पर जल चढ़ाने की परंपरा आज भी देखी जाती है। इसके पीछे केवल आस्था नहीं, बल्कि एक गहरी पौराणिक कथा जुड़ी हुई है, जो शनि देव और एक तपस्वी बालक के बीच घटित घटनाओं से संबंधित है।
Shani Dev: दधीचि ऋषि का त्याग
प्रश्नोपनिषद में वर्णित कथा के अनुसार, महर्षि दधीचि ने लोक कल्याण के लिए अपनी अस्थियां देवताओं को दान कर दी थीं, जिससे वृत्तासुर का अंत हो सके। इस घटना से व्यथित उनकी पत्नी ने सती होने का निर्णय लिया। जाते-जाते उन्होंने अपने तीन वर्ष के पुत्र को एक विशाल पीपल के वृक्ष के कोटर में रख दिया। वहीं, वृक्ष उस बालक का सहारा बना। अनाथ बालक ने पीपल के कोटर में गिरने वाले फलों को खाकर जीवनयापन किया। समय बीतता गया और वह बालक धीरे-धीरे बड़ा होने लगा। एक दिन उसी मार्ग से देवर्षि नारद गुजरे। उन्होंने बालक की दशा देखकर उससे उसका परिचय पूछा, लेकिन बालक अपने माता-पिता के बारे में कुछ भी नहीं जानता था।
अतीत का रहस्य
नारद ने अपनी दिव्य दृष्टि से बालक को उसके जन्म का सत्य बताया। उन्होंने बताया कि वह महान दानी दधीचि का पुत्र है और उसके माता-पिता की मृत्यु शनि की महादशा के प्रभाव में हुई थी। उसी क्षण नारद ने उस बालक का नाम पिप्पलाद रखा। यह सत्य जानकर पिप्पलाद के मन में शनि के प्रति गहरा आक्रोश उत्पन्न हुआ। पिप्पलाद ने ब्रह्मा की कठोर तपस्या की। तप से प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने उसे वरदान मांगने को कहा। पिप्पलाद ने ऐसी शक्ति मांगी कि उसकी दृष्टि पड़ते ही कोई भी भस्म हो जाए। वरदान मिलते ही उसने शनि का आह्वान किया और उन पर अपनी दृष्टि डाली, जिससे शनि का शरीर जलने लगा।
ब्रह्मा का हस्तक्षेप
अपने पुत्र को संकट में देखकर सूर्य देव भी असहाय हो गए और ब्रह्मा से सहायता मांगी। ब्रह्मा प्रकट हुए और पिप्पलाद से शनि को छोड़ने का आग्रह किया, लेकिन वह तैयार नहीं हुआ। तब ब्रह्मा ने उसे एक के बदले दो वर मांगने का प्रस्ताव दिया। पिप्पलाद ने पहला वर मांगा कि पांच वर्ष की आयु तक किसी भी बच्चे पर शनि का प्रभाव न हो। दूसरा वर यह कि जिसने पीपल ने उसे जीवन दिया, इसलिए जो व्यक्ति सूर्योदय से पहले पीपल पर जल चढ़ाएगा, उस पर शनि की महादशा का प्रभाव नहीं पड़ेगा। इसी विश्वास से पीपल पूजा की परंपरा शुरू हुई। आज भी लोग शनि दोष से राहत के लिए पीपल की पूजा करते हैं।
Note: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। headlinesindianews.com इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है।
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