CG News : छत्तीसगढ़ में सिकल सेल एनीमिया अब सिर्फ मेडिकल शब्द नहीं रह गया है, बल्कि हजारों परिवारों की रोजमर्रा की परेशानी बन चुका है। खासकर बस्तर और सरगुजा जैसे आदिवासी इलाकों में यह बीमारी धीरे-धीरे एक बड़े संकट का रूप ले रही है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि प्रदेश की करीब 9 से 10 प्रतिशत आबादी सिकल सेल से या तो पीड़ित है या इसकी वाहक है, लेकिन गांवों में रहने वाले लोग कहते हैं कि असली हालात इससे भी ज्यादा खराब हैं। बस्तर के कई गांवों में हाल यह है कि हर सौ बच्चों में एक-दो बच्चे सिकल सेल के साथ जन्म ले रहे हैं।
जिला अस्पतालों में दर्द से बेहाल बच्चे, खून की भारी कमी से जूझते युवा और बार-बार बीमार पड़ने वाली महिलाएं आम नजर आने लगी हैं। कई परिवारों का कहना है कि उन्हें महीने में दो से तीन बार बच्चों को अस्पताल ले जाना पड़ता है, लेकिन हर बार दवा और इलाज मिलना तय नहीं होता।
CG News: आनुवंशिक बीमारी
डॉक्टर बताते हैं कि सिकल सेल एक आनुवंशिक बीमारी है। इसमें खून की लाल कोशिकाएं गोल न रहकर हंसिया जैसी टेढ़ी हो जाती हैं। ये कोशिकाएं नसों में फंस जाती हैं, जिससे शरीर में खून और ऑक्सीजन का सही प्रवाह नहीं हो पाता। इसका असर सीधे दर्द, कमजोरी, बार-बार संक्रमण और धीरे-धीरे शरीर के अंगों पर पड़ता है। सबसे ज्यादा खतरा तब होता है, जब दो ऐसे लोगों की शादी हो जाती है, जो सिकल सेल के वाहक होते हैं। ऐसे मामलों में बच्चे के पूरी तरह सिकल सेल पीड़ित पैदा होने की संभावना बहुत ज्यादा होती है। हालांकि, जानकारी की कमी और सामाजिक डर के चलते लोग जांच कराने से बचते हैं।
हालत बेहतर नहीं
ग्रामीण इलाकों में इलाज की हालत भी बेहतर नहीं है। कई प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में शुरुआती जांच तक की सुविधा नहीं है। जरूरी टेस्ट जिला मुख्यालयों तक सीमित हैं, जहां पहुंचना हर परिवार के लिए आसान नहीं। नियमित ब्लड चढ़ाने की जरूरत वाले मरीजों को भी अक्सर इंतजार करना पड़ता है। हाइड्राक्सी यूरिया जैसी जरूरी दवाएं हर मरीज तक समय पर नहीं पहुंच पातीं। अब धीरे-धीरे समाज भी इस खतरे को समझने लगा है। साहू समाज ने फैसला लिया है कि शादी से पहले सिकल सेल की जांच को जरूरी बनाया जाएगा, ठीक वैसे ही जैसे कुंडली मिलाई जाती है। समाज के लोगों का कहना है कि अगर समय रहते जांच हो जाए, तो आने वाली पीढ़ियों को इस दर्द से बचाया जा सकता है।
सामाजिक बदनामी
सिंधी समाज पहले से थैलेसिमिया को लेकर काम करता रहा है और अब सिकल सेल को लेकर भी जागरूकता बढ़ा रहा है। समाज के प्रतिनिधियों के अनुसार, युवक-युवतियों की शादी से पहले जांच कराई जाए, ताकि बीमारी आगे न फैले। दरअसल, सबसे बड़ी रुकावट आज भी डर और सामाजिक बदनामी है। गांवों में लोग सोचते हैं कि जांच कराई तो शादी टूट जाएगी। इसी डर में बीमारी छिपा ली जाती है और इसका खामियाजा बच्चों को भुगतना पड़ता है। अगर गांव-गांव मुफ्त स्क्रीनिंग, दवा और ब्लड बैंक की सुविधा नहीं बढ़ाई गई, तो आने वाले सालों में यह बीमारी छत्तीसगढ़ के लिए और बड़ी मुसीबत बन सकती है।
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