Vrindavan News : वृंदावन के आरक्षित वन क्षेत्रों को पर्यावरण के अनुकूल बनाने के लिए वन विभाग ने बड़ा अभियान शुरू किया है। शहर के दो प्रमुख प्रवेश मार्गों पर स्थित वन ब्लॉकों से विलायती बबूल (जूली फ्लोरा) को हटाकर उसकी जगह एक लाख चौड़ी पत्ती वाले देशी पौधे लगाए जाएंगे। इस पहल का उद्देश्य जैव विविधता को बढ़ावा देना, हरित आवरण बढ़ाना और स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करना है। पौधों की सिंचाई के लिए सौर ऊर्जा आधारित व्यवस्था भी विकसित की जाएगी, ताकि पूरे साल उनकी देखभाल सुचारु रूप से हो सके।
वन विभाग की योजना के तहत मथुरा मार्ग स्थित अहिल्यागंज आरक्षित वन क्षेत्र और छटीकरा मार्ग स्थित सुनरख आरक्षित वन क्षेत्र को संरक्षित और विकसित किया जाएगा। करीब 10 हेक्टेयर में फैले अहिल्यागंज वन क्षेत्र तथा लगभग 119.6 एकड़ क्षेत्रफल वाले सुनरख आरक्षित वन को चारों ओर से तार फेंसिंग कर सुरक्षित किया जा रहा है।
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इसके बाद इन क्षेत्रों में चरणबद्ध तरीके से देशी प्रजातियों के पौधों का रोपण किया जाएगा। वन विभाग ने विलायती बबूल हटाने के बाद पीपल, बरगद, पाकड़ समेत चौड़ी पत्ती वाले देशी वृक्षों के पौधे लगाने की योजना बनाई है। इन पेड़ों को स्थानीय जलवायु और वन्य जीवों के लिए अधिक उपयोगी माना जाता है। विभाग का मानना है कि इससे पक्षियों, छोटे वन्य जीवों और अन्य जैविक प्रजातियों के लिए बेहतर प्राकृतिक आवास तैयार होगा और पर्यावरणीय संतुलन को मजबूती मिलेगी।
होगी सिंचाई
पौधों की नियमित सिंचाई सुनिश्चित करने के लिए वन विभाग आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल करेगा। प्रत्येक पांच हेक्टेयर क्षेत्र में सोलर पैनल और सबमर्सिबल पंप लगाए जाएंगे, जिससे बिजली पर निर्भरता कम होगी और सौर ऊर्जा के जरिए पौधों को पानी उपलब्ध कराया जा सकेगा। इस पूरी व्यवस्था की निगरानी के लिए वन क्षेत्र में वन क्षेत्राधिकारी का कार्यालय भी स्थापित किया गया है, ताकि संरक्षण कार्यों पर लगातार नजर रखी जा सके।
मंगाए जा रहे पौधे
बड़े स्तर पर पौधारोपण के लिए पौधों की उपलब्धता सुनिश्चित करने का जिम्मा अलीगढ़ की कार्यदायी संस्था को दिया गया है। इसके अलावा प्रदेश के अन्य क्षेत्रों से भी पौधे मंगाए जा रहे हैं। रोपण कार्य में विभागीय कर्मचारियों की टीम लगातार जुटी हुई है। वन क्षेत्राधिकारी विपिन मिश्रा ने बताया कि सौर ऊर्जा से संचालित सबमर्सिबल पंपों के जरिए पौधों की नियमित सिंचाई की जाएगी, जिससे पौधों के बेहतर विकास और वन क्षेत्र के दीर्घकालिक संरक्षण में मदद मिलेगी।





