जीवन जीना चाहिए पारुल कवालिया जैसा ।

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नई दिल्ली /सुधीर गांधी : कुछ नया करने,समाज के दूसरे छोर पर विस्थापित हजारों दिव्यांगो के जीवन में उजाला लाने,गरीब,मज़लूम, और वंचित तबके के बारे में समावेशी सोंच रखने वाली पारुल कवालिया महज तेइस साल की हैं!बचपन से ही समाज के आख़िरी पॉयदान पर खड़े उन लाखों लोगों के जिंदगी को सवारने ,उनके बेहतर जीवन यापन ,और उनको मुख्य धारा में जोड़ने की मुहिम को मज़बूती देने वाली पारुल Ashtavakra institute of rehablitation science and research सेंटर जो पीतमपुरा दिल्ली में स्थित है वहाँ से डिप्लोमा की डिग्री प्राप्त की ! बचपन मे कुछ ख़ास करने की मादा रखने वाली , अपने कैरियर को सवारने के लिए विभिन्न अवसरों की तिलांजलि देकर समाजिक सेवा से जुड़ना पसन्द किया! कठिन परिश्रमी, सामाजिक अन्याय और वर्तमान में देश के लिए खड़ी हुई चुनौतियों से निपटने के लिए तत्पर हैं! अस्टबक्र इंस्टिट्यूट ऑफ रिहैबिलिटेशन सेंटर से पढ़ाई के बाद सरकारी नौकरी चुनने की बजाय , दिबयाँग जनों, के प्रति सामाजिक सोच को बदलने और उनके जीवन के तौर तरीकों को बेहतर बनाने ,उनको शिक्षित करने, मुख्य धारा में जोड़ने के लिए 2017 में साईं स्पेशल अकेडमी की शुरआत की, इस अकेडमी की संरक्षक और फाउंडर होने के नाते, अपने उत्तरदायित्वों को भली भांति समझती हैं , और हजारो हेय दृष्टि से देखे जाने वालों बच्चों को प्रशिक्षित करके उन्हें नए अवसरों की तरफ प्रेषित करती हैं! महज 19 साल की पारुल ने सैकड़ो दिव्यांगों के आत्मसमान,प्रतिभा विकास ,शिक्षा की ब्यवस्था करके उनके जिंदगी में पुनः प्रकाश की किरण प्रवाहित की। अकेडमी के प्रयासों की वजह से बहुत सारे बच्चों जिन्होंने विकलांगता को अपनी कमजोरी नही ,बल्कि ताकत बनाया है,और कुछ ने तो विकलांगता को अभिशाप नही बरदान साबित किया है!विकलांगता एक ऐसा शब्द है ,जो किसी को भी शारीरिक ,मानसिक,और उसके बौद्धिक विकास में अड़चनें पैदा करता है, और समाज मे इन्हें अलग नजीरिये से देखा जाता है! उन सारे बच्चों और बचियों में स्टीफन हॉकिंग और हेलेन केलर की छवि देखने वाली पारुल आज जिंदगी के नए आयामों को छूने के लिए बेताब और अग्रसर हैं! वर्तमान में पारुल कवालिया रमा विहार में स्थित “युवा शक्ति मॉडल स्कूल ” में स्पेशल एजुकेटर के पद पर आसीन हैं! कभी सहपाठी रहीं,पूर्वी सिंहल जो इनकी अभिन्न मित्र हैं,बताती हैं पारुल शुरू से ही बेहद जिद्दी स्वभाव की थी,जेंडर एकवालिटी के मुद्दो पर घर और बाहर हमेशा संघर्षिल रहती थी! जीवन मे कुछ कर गुजरने और कॉलेज में अपने कृत्यों से सुर्ख़ियों में रहना पारुल को हमेशा पसंद रहा है! सामाजिक कुरीतियों से लड़ते हुए जाति धर्म से ऊपर उठकर समाज में अपनी छवि को लेकर हमेशा आशस्वत रहने वाली पारुल दृढ़ इच्छा शक्ति, सुंदर विचारों से अपने प्रिय मित्रों के बीच काफी लोकप्रिय हैं! भारतीय पुनवार्स परिषद द्वारा संचालित विभिन्न कार्यक्रमों में बढ़ चढ़ कर इन्होंने भाग लिए! भारतीय पुनर्वास परिषद अधिनियम के तहत विभिन्न कार्यक्रमो को इन्होंने अपने स्तर से संचालित किया! मध्यमबर्गीय परिवार में जन्म लेने वाली पारुल निकट भविष्य में अपने आप को एक “स्वत्रंत व्यक्तित्व” के रूप में प्रस्तुत करने के लिए प्रयाश शील हैं! मध्यमबर्गीय परिवार की परेशानियों को दरकिनार करते हुए, भारतीय समाज मे सेवा भाव की मूल भावना को इनके प्रयासो में आसानी से समझा जा सकता है! हेलेन केलर को अपना आदर्श मानने वाली पारुल उनके द्वारा कहे हुए शब्दों ” हमे सच्ची खुशी तब तक नही मिल सकती ,जब तक कि हम दूसरों की जिन्दगी को खुशगवार बनाने की कोशिश नही करते” के सिद्धान्तों पर अडिग हैं!सैकड़ो बच्चों की प्रिय पारुल आज भी कोरोनॉ महामारी के दौरान अपने व्यक्तिगत प्रयासो की वजह से गरीबों की मदद करने में कोई कमी नही छोड़ रही है! इस कार्य मे इनके घर वाले,रिश्तेदार, सगे और मित्र गण पूरी मदद कर रहे हैं! कुछ दिन पहले इनके प्रयासों को दिल्ली के कुछ समाचार चैनलो और प्रिंटमीडिया ने भी प्रसारित किया और लोगों से इनके मुहीम में जुड़ने के लिए निवेदन किया! हर व्यकितत्व को इनके जीवन से कुछ सीख लेनी की जरूरत है । पारुल चाहती तो अच्छा जीवन जी सकती थी लेकिन उन्होंने अपने कर्मो को मानव समाज की सेवा के लिए लगा दिया है। वो कहती है हमें लोगों की सेवा करके अच्छा लगता है।

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