बिहार में बाल विवाह की घटनाओं में 1.7 प्रतिशत की आई कमी

पटना, 25 जनवरी: गांव से मिडिल स्कूल दूर होने के कारण 13 वर्षीय सरिता ने पांचवीं कक्षा के बाद स्कूल जाना छोड़ दिया था. वो उस महादलित समुदाय से आती है जिसके अधिकतर बच्चे, ख़ासकर लड़कियां स्कूल नहीं जातीं. ऊपर से सरिता के श्रमिक माता-पिता ने उस पर उसके छोटे भाई-बहन की देखभाल की जिम्मेदारी भी सौंप दी थी. पिछले वर्ष जून में उसकी परेशानियां और तब बढ़ गईं जब उसके माता-पिता ने पड़ोस के गांव में रहने वाले 20 वर्ष के युवक से उसकी शादी ठीक कर दी. लड़का चेन्नई में एक फैक्ट्री में काम करता था और लॉकडाउन के कारण गांव वापस आया था. मासूम सरिता को ये तक समझ नहीं थी कि इस ख़बर को सुनकर क्या प्रतिक्रिया दे? लेकिन ख़ुशकिस्मती से यूनिसेफ, महिला विकास निगम और जिला प्रशासन की मदद से उसकी शादी रोकी गई. हालांकि, परिवार और आस-पड़ोस के विरोध के कारण शादी रोकना आसन नहीं था, लेकिन स्थानीय प्रशासन और पुलिस द्वारा समझाने-बुझाने के बाद सरिता के परिवार वाले उसकी शादी रोकने को तैयार हो गए और वादा किया कि वो अपनी बेटी की शादी 18 वर्ष की उम्र पूरा करने के बाद ही करेंगे.


यूनिसेफ बिहार की बाल संरक्षण अधिकारी गार्गी साहा बताती हैं कि महिला विकास निगम, यूनिसेफ़ और अन्य सहयोगी संस्थाओं के संयुक्त प्रयास से पिछले डेढ़ वर्षों में 125 बाल विवाह रोके गए. सरिता और उनका होने वाला 20 वर्षीय पति उनमें से एक हैं. अगर हम 2 अक्टूबर 2017 को बिहार सरकार द्वारा बाल विवाह के विरुद्ध शुरू हुए मुहिम से लेकर पिछले दिसंबर तक की बात करें, तो अभी तक 1,000 से ज्यादा बाल विवाह रोके जा चुके हैं.


बाल विवाह सिर्फ लड़कियों तक ही सीमित नहीं है बल्कि लड़के भी इससे प्रभावित हैं. समस्तीपुर के गानोपुर गांव के 19 वर्षीय अजय दास की शादी पिछले साल 10 मई को तय कर दी गई थी. इसकी सूचना मिलते ही प्रखंड विकास पदाधिकारी जो सहायक बाल विवाह निषेध अधिकारी के तौर पर भी कार्य करते हैं ने स्थानीय पुलिस की मदद से विवाह को सफलतापूर्वक रूकवाया. प्रशासन द्वारा समझाने के बाद अजय के परिवार ने 21 वर्ष के बाद उसकी शादी करने का वादा किया.


हाल ही में जारी राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण 5 के अनुसार भी बिहार में बाल विवाह की घटनाओं में 1.7 प्रतिशत की कमी आई है. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण 4 के दौरान 42.5% की तुलना में अब यह घटकर 40.8% रह गया है. हालांकि यह गिरावट बहुत ख़ास नहीं है, लेकिन यह निश्चित रूप से आने वाले वर्षों में बेहतर परिणामों की उम्मीद जगाती है. बीते वर्षों में राज्य सरकार और अन्य डेवलपमेंटल पार्टनर्स द्वारा किए गए संयुक्त प्रयासों का नतीजा है. नोडल एजेंसी होने के नाते महिला विकास निगम ने यूनिसेफ और अन्य संस्थाओं की मदद से बाल विवाह की घटनाओं को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.


यूनिसेफ बिहार के बाल संरक्षण विशेषज्ञ मंसूर क़ादरी ने बिहार में बाल विवाह की समस्या पर रौशनी डालते हुए कहा कि कम उम्र में शादी होने से लड़कियां किशोरोवस्था में ही गर्भवती हो जाती हैं और परिणामस्वरूप बच्चे कुपोषण के शिकार हो जाते हैं. साथ ही बच्चे और माँ की मृत्यु दर भी बढ़ती है. हमारा अनुभव बताता है कि गरीबी, लड़कियों की शिक्षा के प्रति उदासीनता, उनकी सुरक्षा संबंधी आशंकाएं और सबसे बढ़कर जागरूकता की कमी बाल विवाह के कुछेक महत्वपूर्ण कारण है. इसे देखते हुए हमने पंचायती राज, जीविका, स्वास्थ्य, समेकित बाल विकास निदेशालय और पुलिस विभागों के अधिकारियों को प्रशिक्षित कर बाल विवाह के प्रति निरंतर जागरूकता फैलाने का कार्य किया है जिसके बाल विवाह की घटनाओं में कमी के रूप में अच्छे परिणाम देखने को मिले हैं.


यूनिसेफ बिहार की संचार विशेषज्ञ निपुण गुप्ता ने कहा कि बाल विवाह के कारण बचपन खत्म हो जाता है. इससे बच्चे के शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा के अधिकार प्रभावित होते हैं. इससे न सिर्फ किशोरी बल्कि उसका पूरा परिवार प्रभावित होता है. राष्ट्रीय बालिका दिवस के अवसर पर हम सभी को प्रतिज्ञा लेनी चाहिए कि हम लड़कियों के विरुद्ध भेदभाव को मिटाने के लिए कार्य करेंगे और बाल विवाह को जड़ से उखाड़ फेंकेंगे.

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