चमकी बुखार से मर रहे गरीब के बच्चे, बिहार में आयुष्मान योजना फेल

बहुचर्चित स्वास्थ्य बीमा योजना आयुष्मान भारत को बिहार में भी बड़े ताम-झाम के साथ शुरू किया गया। योजना को शुरू हुए एक महीने हो गये मगर इस योजना का लाभ उन तक नहीं पहुंच सका है जिनके लिए कथित रूप से इसे लागू किया गया था। मुजफ्फरपुर में जब चमकी बुखार से 170 से अधिक बच्चों की मौ’त हो गई और रोजाना यह संख्या बढ़ती ही जा रही है ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि ऐसी योजना का क्या लाभ जो गरीब परिवार के बच्चों को बचा भी न सके।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बढ़-चढ़ कर दावे कर रहे थे कि इस योजना का देश के 10 करोड़ परिवार लाभ ले सकेंगे। जहां तक बिहार का सवाल है तो बिहार के एक करोड़ आठ लाभ परिवार आयुष्मान योजना के दायरे में आएंगे। बेहतर इलाज के लिए सभी मरीज पटना की ओर ही मुखातिब होते हैं। योजना को लागू हुए नौ माह हो रहे हैं इसके बावजूद राजधानी तक में जब आंकड़ा 200 को भी नहीं पार कर सका है तब अन्य जिलों में क्या उपलब्धि हुई होगी इसका अनुमान लगाया जा सकता है। वजह साफ है कि योजना को अमली जामा पहनाने में न तो स्वास्थ्य मंत्री की कोई दिलचस्पी है और न ही स्वास्थ्य विभाग के अफसरों की। जुमलेबाजी तो की गई कि इस योजना के तहत हर परिवार को हर साल पांच लाख तक की कैशलेस सुविधा मिलेगी मगर हकीकत तो कुछ और बयां करती है। चमकी बुखार से बेहतर कौन सा उदाहरण हो सकता है?

योजना को लांच करने वक्त तो कहा जा रहा था कि इससे स्वास्थ्य के क्षेत्र में बड़ा बदलाव आयेगा. सरकार और निजी दोनों क्षेत्र में अस्पतालों में सुविधा बढेगी मगर ऐसा कुछ तो नजर नहीं आ रहा। इस योजना का लाभ गरीब और अभिवंचित लोगों जैसे दिव्यांग, एससीएसटीष् भूमिहीन, दिहाड़ी मजदूर, बेघर व्यक्ति, भिखारी, रिक्शा चालक, दुकान के कर्मी, कूड़ा एकत्र करने वाले घरेलू नौकर, रेहड़ी दुकानदार, मोची, मजदूर, राजमिस्त्री आदि को मिलना है मगर इन लोगों तक इस योजना की जानकारी पहुंचाने और उन तक कार्ड पहुंचाने की जिम्मेवारी सरकार नहीं ले रही है। ऐसे में कैसे होगा उनका कैशलेस इलाज? यदि सरकार का इरादा लोगों को वास्तविक रूप में आयुष्मान भारत का लाभ देना होता तो वह योजना का दायरा बढ़ा कर इसमें निजी संस्थानों में कार्यरत लोगों को भी शामिल करती जो कम वेतन में काम करने को मजबूर हैं और किसी तरह जिंदगी की गाड़ी खींच रहे हैं।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जो भी दावा करें सरकारी अस्पतालों में डाक्टरों की कमी है तथा अप्रशिक्षित स्टॉफ के सहारे अस्पताल चल रहे हैं। खुद मुख्यमंत्री ने स्वीकार किया कि मुज़फ्फ़रपुर में म’रने वाले बच्चे और उनके परिवार वाले ज़्यादातर बच्चे बहुत ही ग़रीब परिवार से आते हैं। ये वही तबका है जिनको ध्यान में रखकर केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना की शुरुआत की थी। पांच लाख तक के कैशलेस इलाज की राशि में सभी जाँच, दवा, अस्पताल में भर्ती के खर्च शामिल हैं। इसमें कैंसर और हृदय रोग जैसी गंभीर बीमारियों सहित 1300 बीमारियां शामिल की गई हैं। मगर सरकार बताये कि बच्चों की जान बचा सके ऐसी योजना का क्या लाभ?

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